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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:घर बैठे कार्य करने से मनुष्य को नुकसान हुआ है, छात्र खेलकूद से वंचित रहे; खेलना शिक्षा का एक अहम हिस्सा

3 महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

महामारी के कारण टेक्नोलॉजी के जरिए लोग घर बैठकर अपने दफ्तर का काम करते रहे। छात्रों ने इसी तरह इम्तिहान दिए। प्रिंटिंग की मशीनें चलाने वाले काम पर आते रहे। साथ ही घर-घर जाकर अखबार देने वाले हॉकर भी मैदान में सक्रिय रहे। विदेशों में अखबार केवल सप्ताहांत पर प्रकाशित होते हैं। वहां हॉकर नहीं हैं।

ऑस्ट्रेलिया में क्रिसमस के बाद वाले दिन हर परिवार अपने हॉकर को भेट देता है। इसे बॉक्स डे कहा जाता है। रेस्त्रां, एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन पर अखबार रखे होते हैं। अधिकांश लोग यह मानते हैं कि घर बैठे कार्य करने से मनुष्य को नुकसान हुआ है। छात्र खेलकूद से वंचित रहे। दरअसल खेलना शिक्षा का ही एक हिस्सा है।

खेलने से मिलनसारिता विकसित होती है। हम सब अपने अपने अजनबी हो गए हैं। इन बातों का प्रभाव मनुष्य की विचार प्रक्रिया पर भी पड़ा है। मामला कुछ कुछ ऐसा हो गया है कि दूल्हा अकेले जा रहा है, कोई बारात या बैंड बाजा नहीं है। ख्वाजा अहमद अब्बास की बहु सितारा फिल्म ‘चार दिल चार राहें’ में ऊंची जाति का दूल्हा, निम्न जाति की लड़की से विवाह करने जाता है। रूढ़िवादी समाज ने इस विवाह का बहिष्कार किया है। राज कपूर दूल्हें हैं और मीना कुमारी दुल्हन अभिनीत कर रही हैं।

महात्मा गांधी ने नवजीवन शिक्षा संस्थान के तहत कुछ संस्थाओं की स्थापना की थी। अहमदाबाद से कुछ दूरी पर नवजीवन संस्थान द्वारा स्थापित पाठशाला में खाकसार को छात्रों से बातचीत का अवसर मिला। विषय रहा- शिक्षा संस्थान में सिनेमा का उपयोग। फिल्म से उदाहरण देकर सिखाए हुए पाठ छात्र आसानी से समझ लेता है।

मसलन पंडित नेहरू के लेख ‘कमिंग ऑफ गांधी’ में प्रस्तुत किया गया कि ‘फैंटम ऑफ फियर बिल्ड्स इट सेल्फ इन मोर फियर दैन फियर इन रियलिटी।’ छात्रों के समझने के लिए खाकसार ने बताया कि फैंटम एक काल्पनिक पात्र है जो इतना बलशाली है कि आती हुई रेलगाड़ी को अपने हाथों से रोक देता है।

श्री तिलक की पत्रिका के सहायक संपादक भालजी पेंढारकर ने अपनी फिल्म ‘वंदे मातरम आश्रम’ में प्रस्तुत किया कि शिक्षा मनुष्य को दिन प्रतिदिन जीवन की समस्याओं को समझने में सहायता करते हुए महान कालजयी पाठ भी पढ़ा सकती है। आदर्श के लिए जीने और मरने की शक्ति का विकास करना जरूरी है।

पान की दुकान खोलने जैसे काम को करने से पहले कत्था और चूना बनाना तथा सुपारी काटना सीखना पड़ता है। यही कारण है कि अधिकांश सिने विधा पढ़ाने वाले संस्थानों से कोई फिल्मकार नहीं हुआ। पंडित नेहरू द्वारा प्रारंभ पुणे फिल्म संस्थान के प्रारंभिक दौर में शबाना आज़मी, नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, कुंदन शाह और अजीज मिर्जा जैसे कलाकारों ने अपना स्थान बनाया। बाद में महाभारत सीरियल के एक कलाकार को पुणे संस्थान का डायरेक्टर बनाते ही छात्र हड़ताल पर चले गए।

संस्थान अब लगभग मृत समान है। यह गौरतलब है कि जीवन के हर क्षेत्र में माइथोलॉजी के पात्र समान व्यक्ति ओहदेदार हो गए, हमारे पहरेदार हो गए। तर्कसम्मत विचारधारा को नकार दिया गया है। यह ‘एज ऑफ रीजन’ पॉल सार्त्र द्वारा लिखी किताब का स्थान एस राजामौली की फिल्म ‘बाहुबली’ की पटकथा ने ले लिया है।

घर बैठकर टेक्नोलॉजी की सहायता से अध्ययन करने वाले छात्र अपने जीवन में कई कठिनाइयों से जूझने जा रहे हैं। वुडी एलन की फिल्म में प्रस्तुत किया गया कि टेक्नोलॉजी से खेलने वाला पात्र यह साधारण बात नहीं समझ पाया कि यथार्थ जीवन में चाकू दिखाकर उसके पैसे लूटे जा रहे हैं।

वह अपने मोबाइल से अपराध चैनल हटाकर हास्य चैनल लगाने का प्रयास करता रहता है। राजकुमार हिरानी की ‘थ्री ईडियट्स’ पाठ को रट लेने और समझने के अंतर को स्पष्ट करती है। हिरानी की अगली फिल्म का नाम ‘रूरीटेनिया ऑफ ईडियट्स’ भी हो सकता है।