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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:मनुष्य वस्त्र धारण करता रहा है, लेकिन फैशन में आभास होता है कि वस्त्र ने मनुष्य को धारण कर लिया हो

4 महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

रंगमंच, सिनेमा और सर्कस इत्यादि मनोरंजन के माध्यमों में पात्र द्वारा पहनी गई पोशाक उसकी विचार शैली और व्यवसाय का कोई संकेत दे सके ऐसा प्रयास किया जाता है। पोशाक त्वचा की रक्षा करते हुए अभिव्यक्ति का माध्यम बन जाती है। मनुष्य तो जानवर की त्वचा तक का व्यापार करता है। वृक्ष की त्वचा, छाल से भी दवा बनाई जाती है। सदियों पूर्व एक व्यक्ति को जंगल में भटकते हुए ज्वर चढ़ गया। वह रेंगते हुए पानी तक पहुंचा। पानी पीने से उसका ताप घटने लगा।

बाद में परीक्षण से पाया गया कि वृक्ष के पत्ते और छाल, पानी में गिरे थे, इसलिए ताप घटा। शोध के अगले चरण में कुनाइन का आविष्कार हुआ। बहरहाल फिल्मी पात्र ही नहीं, खिलाड़ियों की पोशाक भी तय होती है। फौज की पोशाक बहुत चिंतन करके बनाई गई है। फिल्म में फौजी पात्र की पोशाक के लिए भी एक टेलरिंग शॉप तय है। इसी तरह पुलिस इंस्पेक्टर और आईजी की पोशाक में अंतर होता है। फिल्म के मुख्य पात्रों के ड्रेस डिजाइनर होते हैंं, परंतु दृश्य में भीड़ को अपनी पोशाक पहननी होती है।

अच्छी पोशाक वालों को काम अधिक मिलता है। ताहिर हुसैन की फिल्म में सलीम खान ने छोटी चरित्र भूमिका की थी। अगली फिल्म के लिए उनका चयन मात्र इसलिए हुआ था कि पिछली फिल्म में उनके सिलवाए सूट का उपयोग हो सके। कुछ साधन संपन्न लोग चिंदी चोर होते हैं। शादी की महंगी शेरवानी बाद में कभी पहनी ही नहीं जाती, क्योंकि वजनी होती है। यहां तक कि किसी कारण पत्नी की मृत्यु के बाद दूसरे विवाह में भी नई शेरवानी पहनते हैं।

पुरानी को ‘अभागी’ मान लिया जाता है। दुल्हन का महंगा लहंगा भी बाद में काम नहीं आता। फिल्म ‘जॉली एलएलबी’ में जज की इकलौती बेटी की जिद है कि बॉलीवुड के विख्यात डिजाइनर का 5 लाख रु. कीमत वाला लहंगा पहनेगी। बेचारे जज साहब की जीवनभर की बचत उसमें खप सकती है। जब कुछ फिल्मकारों की फिल्में सफल हो गईं तब ये ड्रेस डिजाइनर ब्रांड नेम बने। ऐसे फिल्म निर्माण में अनावश्यक खर्च बढ़े।

भानु अथैया ने सर रिचर्ड एटनबरो की फिल्म ‘गांधी’ के लिए पोशाक बनाईं थींं। उन्हें ऑस्कर पुरस्कार मिला था। भानु, फिल्मकार से चरित्र की पूरी जानकारी लेने के बाद ही अपना काम करती थीं। उन्होंने जितनी फिल्में कीं, उससे अधिक प्रस्ताव अस्वीकार किए क्योंकि फिल्मकार जानता ही नहीं था कि वह क्या बना रहा है! पगड़ी, साफा, हैट और टोपी के भी सांकेतिक अर्थ होते हैं। पंजाबी अपनी पगड़ी को अपना आत्मसम्मान मानते हैं।

गौरतलब है कि चार्ली चैपलिन तंग जैकेट और ढीली पतलून पहनता है, जो उसके घुटते हुए अरमानों की अभिव्यक्ति है। जूते के तले में सुराख है। वह अपने आत्मसम्मान के प्रतीक हैट को संभाले रखता है। गिरते-पड़ते घिसटते हुए ही जीवन मार्ग पर चलता है। इस तरह पात्र की पोशाक अन्याय व असमानता आधारित समाज की विडंबनाओं और विसंगतियों को अभिव्यक्त करती है। हॉलीवुड सितारा रीता हेवर्थ को 27 करोड़ का वेडिंग गाउन पहनाया गया और विवाह मात्र 20 दिन टिका।

फिल्म ‘पीके’ में वस्त्रों द्वारा मनुष्य के मूल्यांकन का मखौल उड़ाया गया है। क्रिश्चियन दुल्हन का शादी का सफेद गाउन लंबा होता है। एक समाज में विधवा सफेद वस्त्र पहनती है। बुर्क़ा काला होता है, उसके भीतर भी स्वतंत्रता की कसमसाहट का प्रतीक लिपस्टिक धारण की जाती है। बंगाल में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन में सभी महिलाएं लाल बॉर्डर की सफेद साड़ी पहनती हैं।

विद्या बालन अभिनीत फिल्म ‘कहानी’ के क्लाइमेक्स में आतंकवादी का वध करके नायिका इन महिलाओं में शामिल हो जाती है। उसे पहचाना ही नहीं जा सकता। अजीब है कि मनुष्य वस्त्र धारण करता रहा है, परंतु फैशन में आभास होता है, मानो वस्त्र ने मनुष्य को धारण कर लिया हो। साड़ी की जगह बरमूडा धारण करने की बात पर तालियां पीटी जा रही हैं।