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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:बहुत-से लोग अब भी पाप-पुण्य की परिभाषा में उलझे हैं, ये सबने अपने-अपने हिसाब से तय कर रखी है

17 दिन पहले
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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar
पं. विजयशंकर मेहता

पुुण्य यानी होशपूर्वक किया गया काम, जिसके परिणाम में शांति मिलती है। पाप यानी बेहोशी में किया गया कर्म, जिसका परिणाम अशांति होता है। बहुत-से लोग अब भी पाप-पुण्य की परिभाषा में उलझे हैं, ये सबने अपने-अपने हिसाब से तय कर रखी है। ऐसा ही रावण ने किया था। वह अपने पाप को पुण्य मानता था। जब राम उसकी फैलाई माया को लगातार काट रहे थे तो उसने विचार किया इस बार ऐसी माया रचूंगा कि सब चौंक जाएंगे। ‘प्रगटेसि बिपुल हनुमान।

धाए गहे पाषान। तिन्ह रामु घेरे जाइ। चहुं दिसि बरूथ बनाइ।’ रावण ने बहुत-से हनुमान प्रकट किए, जो पत्थर लिए दौड़े और चारों तरफ से रामजी को घेर लिया। ये मायावी हनुमान मारो-पकड़ो चिल्ला रहे थे। देखकर रामजी की सेना घबरा गई। रावण ने माया से हनुमान ही क्यों बनाए? असल में उसने सोचा कि पहले मैंने मृगमाया से सीता को छला, अब हनुमान माया से राम को छलूंं।

एक ओर माया खड़ी थी, दूसरी तरफ लीला। रावण की माया यानी जो दिख रहा है, उसके पीछे छल-हिंसा है। रामजी की लीला के पीछे प्रेम व सत्य है। यही फर्क है लीला और माया का। माया तो भगवान भी रचते हैं, पर उनकी माया संसार चलाने के लिए है। रावण जैसे लोग माया संसार बिगाड़ने के लिए रचते हैं।

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