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ओम गौड़ का कॉलम:नक्सली हमलों के बाद घटना की निंदा जैसी रस्म अदायगी बंद हो, सरकारें बताएं कि ऐसे हमले आखिर हम कब तक झेलते रहेंगे?

17 दिन पहले
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ओम गौड़ का कॉलम, नेशनल एडिटर (सैटेलाइट), दैनिक भास्कर - Dainik Bhaskar
ओम गौड़ का कॉलम, नेशनल एडिटर (सैटेलाइट), दैनिक भास्कर

बीजापुर-सुकमा बॉर्डर पर टेकलगुड़ा में हुए नक्सली हमले में 23 जवानों की शहादत न केवल सुरक्षा व्यवस्था की बड़ी चूक है, बल्कि इसे केंद्र और राज्य सरकारों की बदइंतजामी कहना ज्यादा उचित हाेगा। नक्सली हमले या किसी सुरक्षा में चूक जैसे मामलों में नेताओं पर घटना की निंदा करने जैसी रस्म अदायगी पर तो रोक लगा देना चाहिए। कोई एक यह बताने का साहस नहीं कर पा रहा है कि ऐसे हमले आखिर हम कब तक झेलते रहेंगे?

जब पहले सूचना आई कि बीजापुर-सुकमा बॉर्डर पर भारी संख्या में नक्सली जमा हुए हैं तो उसे हल्के में क्यों लिया गया? हमने दो हजार जवान अलग-अलग टुकड़ियों में नक्सलियों से मुकाबला करने उतार दिए, लेकिन जोनागुड़ा की तरफ गए 700 जवान फंस गए। यह तथ्य चौंकाने वाला है कि नक्सलियों ने रॉकेट लॉन्चर से जवानों पर हमला कर दिया। नक्सली रॉकेट लांचर कहां से लाए? यह हमला सुरक्षा व्यवस्था पर एक ऐसा धब्बा है जिसे न ही केंद्र सरकार धो पाएगी, न ही राज्य सरकार?

लगातार हो रहे नक्सली हमलों से एक सवाल उठता है कि क्या नक्सली समस्या का कोई हल नहीं है? क्या कभी नक्सलियों की सरकारों के साथ बातचीत हुई है? या कोई प्रस्ताव दिया गया है, जवाब न में है लेकिन ऐसी कौन सी समस्या है जिसका हल न हो, लेकिन काेई पहल करने काे तैयार ही नहीं है। हम अपनी सुरक्षा बढ़ा रहे हैं और नक्सली उस सुरक्षा घेरे को भेदने की तैयारी में पूरी ताकत लगाते हैं आखिर यह कब तक चलता रहेगा।

छत्तीसगढ़, उड़ीसा, बिहार और झारखंड का वह जंगली इलाका जो जानवरों का विचरण केंद्र है, वहां इंसानी जानवरों ने कब्जा कर लिया है। इस कल्पना मात्र से सरकारों की रूह कांप जानी चाहिए कि मुट्‌ठीभर नक्सली हमारे सुरक्षा बलों को ललकार रहे हैं और हम हैं कि हाथ पर हाथ धरे बैठे हुए हैं।

देखा जाए तो नक्सलवादियों ने एक तरह से देश के खिलाफ गृहयुद्ध छेड़ रखा है जो केवल सुरक्षाबलों को ही नहीं अपनी सहूलियत से नेताओं और आम आदमी को अपने निशाने पर लेते हैं।

नक्सली हमले की खबरें अब आम हो गई हैं। ऐसे में जरूरत है इनके खिलाफ एक स्थाई ऑपरेशन की जिससे वे नक्सल प्रभावित इलाके जो विकास से कोसों दूर हैं- खुद सरकारें वहां तक सड़कें बनाने या विकास करने से कतराती हैं।

दरअसल, नक्सलवाद एक विचारधारा है, हमें इसका हल ढूंढना चाहिए कि वे चाहते क्या हैं? हम जब तक कोई हल ढूंढें, इससे पहले किसी भी नए हमले की खबर नहीं आनी चाहिए वरना देश का शहीदों की मौत पर मनाए जाने वाले राजनीतिक मातम से भरोसा ही उठ जाएगा।

सबसे दुखद बात यह है कि नक्सलियों से निबटने के लिए केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती होती है ऐसे में राज्य सरकारें हादसों से पल्ला झाड़ लेती हैं- जिस इलाके में नक्सली हमले होते हैं उस इलाके के एसपी और थानेदार तक की जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। हमले किसी के शासन में हों उसे कोई उचित नहीं कहेगा, लेकिन देश चाहता है सरकारें निंदा के साथ शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा, जैसे जुमलेबाजी वाले भाषणों से भी बाज आएं।

अब तक जितने भी हमले हुए हम सभी को भूल गए, क्यों? इसलिए कि सभी राजनीति की भेंट चढ़ गए? देश को नतीजों का इंतजार है पूछिए उन 23 शहीद जवानों के परिजनों से जिनके परिवारों के खून के आंसू सूख नहीं पा रहे हैं, माएं खामोश हैं, पत्नियां विलाप कर रही हैं और बेटे-बेटियों के सिर से पिता का साया उठ गया फिर उदास पिता कह रहा है कि दूसरे बेटे को भी फौजी ही बनाऊंगा। सरकारें चाहें तो इन परिवारों के आंसुओं को पढ़ सकती हैं, उसमें अपना चेहरा भी देख सकती हैं।

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