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भावना सोमाया का कॉलम:एम.एफ. हुसैन: हम न कलाकार की प्रतिभा को समझ पाए और न ही फ़िल्मकार के सृजन को

24 दिन पहले
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भावना सोमाया, जानी-मानी फ़िल्म लेखिका, समीक्षक - Dainik Bhaskar
भावना सोमाया, जानी-मानी फ़िल्म लेखिका, समीक्षक

‘एमएफ हुसैन उतने ही बड़े कलाकार हैं, जितने बड़े माइकल एंजेलो, पाब्लो पिकासो और वैन गॉग हैं, लेकिन हमें इस बात का आज तक एहसास नहीं है।’ यह बात शबाना आज़मी ने दुबई में हुसैन की एक प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए कही थी। यह वाकया 2004 का है। इसके बाद उनकी पेंटिंग्स को लेकर विवाद ने इतना तूल पकड़ा कि हुसैन भारत से बाहर जाने को मजबूर हो गए। जून 2011 में विदेश में ही अपनों से दूर उनका देहांत हो गया।

एक कलाकार और एक फिल्म निर्माता के रूप में मेरे पास उनकी कई यादें हैं। साल 2000 में उनकी फिल्म ‘गजगामिनी’ रिलीज़ हुई थी, लेकिन वह बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हो पाई। ऐसा इसलिए क्योंकि वे अपने समय से आगे के कलाकार थे। रिलीज के कुछ दिनों बाद वे मेरे कार्यालय में आए थे। उन्होंने बताया था कि फिल्म का विचार महाराष्ट्र के पंढरपुर में स्थित काली ईंट की एक दीवार से पैदा हुआ था।

अपनी बात को समझाते हुए उन्होंने बताया कि वाग्देवी खुद को चार अलग-अलग पात्रों में प्रकट करती हैं- ‘दीवार रूपक है और समय, लोगों तथा स्थान को जोड़ने का काम करता है कथानक।’ मैं उन्हें चुपचाप सुनती रही। उन्होंने अपने ट्रेडमार्क यानी बेंत को आराम से मेरी मेज से टिका दिया। जल्दी ही ब्लैक टी आ गई और हुसैन साहब ने अपनी बात जारी रखी...

‘बनारस की दालमंडी की अंतहीन गलियों में नेत्रहीन गायिका संगीता चार अन्य महिलाओं से मिलती है। सतारा की नूर बीबी, स्थिरता की प्रतीक प्रेमचंद की निर्मला, अभिसारिका के पन्नों से निकली सिंधु जो सदा अपने प्रेमी की तलाश में रहती है। और फिर शकुंतला जो कालीदास की कविता से प्रेरित है। शकुंतला केरल के एक जंगल में एक छोटी-सी झोपड़ी में रहती है और यहीं पर वह अपने प्रेमी से मिलती है। क्या यह अनोखी कहानी नहीं है?’

‘यह तो रहस्यमयी है’ मैंने धीरे से कहा। मैं यह जानने के लिए उत्सुक थी कि दशकों तक कैनवास में डूबे रहने के बाद आखिर वह क्या चीज थी जो उन्हें सिनेमा की ओर खींचकर ले आई। उन्होंने कहा, ‘मैंने कई लघु फिल्में बनाईं, लेकिन उनके बारे में कभी बात नहीं की। पिछले कुछ समय से मैं एक फीचर फिल्म बनाने को लेकर काफी उत्सुक था। सिनेमा ऐसा संपूर्ण रचनात्मक माध्यम है जो प्रकाश, गति, ध्वनि और छवियों को जोड़ता है।

अगर मैंने यह फिल्म नहीं बनाई होती तो मैं अब तक 100 फीट लंबी पेंटिंग बना चुका होता। मैंने ‘पोर्ट्रेट ऑफ ए सेंचुरी’ शीर्षक से 40 फीट लंबे कैनवास पर काम भी शुरू कर दिया था कि अचानक मेरे दिमाग में एक फिल्म बनाने का विचार आ गया। मैंने यह फिल्म तीन महिलाओं को समर्पित करने के मकसद से बनाई है - एक वह जिसने मुझे जन्म दिया, एक वह जिसके साथ मैं रहता था और एक वह जो मेरे कामों में रहती आई है।’

तो क्या आपका मतलब आपकी वर्तमान हीरोइन माधुरी दीक्षित से है? उन्होंने इनकार में सिर हिलाया, ‘यह केवल एक धारणा है। मैं केवल उसके रूप को रंगता हूं, उसके चेहरे को नहीं। मेरे लिए न कोई अतीत है, न कोई भविष्य। केवल वर्तमान है क्योंकि यही बीते हुए कल और आने वाले कल को जोड़ता है। गजगामिनी में यही सबकुछ बताया गया है।’

मैंने कहा कि फिल्म विजुअली तो शानदार है, लेकिन यह इतनी अमूर्त है कि उसे समझना बहुत ही मुश्किल है। तो उनका जवाब था, ‘इसे मैंने अनुभव करने के मकसद से बनाया है, न कि समझने या समझाने के उद्देश्य से। जीवन एक भ्रम है और कवि उस भ्रम का प्रतीक है। कवि कालिदास सर्वकालिक महान रचनाकार हैं और कामदेव दिव्य प्रेमी हैं। मेरी फिल्म इसी भ्रम की खोज करती है।’

हर कोई इस बात से आश्चर्यचकित है कि माधुरी दीक्षित ने कैमरे की तरफ पीठ करके डांस क्यों किया? इसके जवाब में हुसैन साहब ने कहा, ‘कैमरे के सामने रहना जरूरी नहीं है। मैं महिला रूप का जश्न मना रहा हूं। मैं महिला को उदात्त रूप में पेश कर रहा हूं, लेकिन दर्शक अब भी उसे एक सेक्सुअल ऑब्जेक्ट के रूप में ही देखते हैं।’ तो शबाना का कहना सही था। हमने हुसैन के जीवित रहते उन्हें महत्व नहीं दिया, न उनकी प्रतिभा का जश्न मनाया।