मिन्हाज मर्चेंट का कॉलम:उज्बेकिस्तान में हो रहे शिखर सम्मेलन में शी जिनपिंग की मुलाकात मोदी से हो सकती है

17 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
मिन्हाज मर्चेंट, लेखक, प्रकाशक और सम्पादक - Dainik Bhaskar
मिन्हाज मर्चेंट, लेखक, प्रकाशक और सम्पादक

कोविड-19 की शुरुआत से अब तक चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग विदेश-यात्रा पर नहीं गए हैं, सिवाय हांगकांग की एक दिवसीय यात्रा के। यही कारण है कि आज से उज्बेकिस्तान में शुरू होने जा रही शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन समिट (एससीओ शिखर सम्मेलन) पर नजर रखी जाएगी। यह संयोग नहीं है कि पिछले सप्ताह चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) स्थित हॉट स्प्रिंग्स-गोगरा पर संघर्ष की स्थिति को समाप्त करने का निर्णय लिया है।

अलबत्ता डेपसांग और देमचोक पर यथास्थिति कायम है। लेकिन अगस्त 2021 के बाद कमांडर-स्तर की 16 वार्ताओं के बाद पहली बार एलएसी पर इस तरह का निर्णय लिया गया है। सवाल उठता है, अब क्यों? शी जिनपिंग के लिए यह समिट भारत से तनावों के परिप्रेक्ष्य में मायने रखती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तभी से जिनपिंग से मिलने या बात करने से इनकार करते आ रहे हैं, जबसे चीन की सेना ने एलएसी पर घुसपैठ का प्रयास किया था और गलवान में 20 भारतीय सैनिकों की हत्या कर दी गई थी।

अनेक महीनों से चीनी वार्ताकार दोनों देशों के नेताओं के बीच बैठक करवाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन मोदी ने कह दिया है कि पहले एलएसी पर संघर्ष की स्थिति समाप्त हो, फिर देखा जाएगा। उज्बेकिस्तान में जिनपिंग की मुलाकात मोदी और व्लादीमीर पुतिन सहित अनेक अन्य मध्य-एशियाई नेताओं से हो सकती है। अक्टूबर में चीन में महत्वपूर्ण 20वीं नेशनल कांग्रेस होगी। जिनपिंग समझ गए हैं कि दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और दूसरे सबसे बड़े उपभोक्ता-बाजार भारत के साथ जोर-आजमाइश में सार नहीं है।

एलएसी पर 28 महीनों से गतिरोध की स्थिति थी, लेकिन सुलह की पहल जिनपिंग की ओर से हुई। अगर शिखर सम्मेलन में मोदी और जिनपिंग मिलते हैं तो इससे मोदी को जिनपिंग के सामने अपना नजरिया रखने का मौका मिलेगा। मोदी को सावधानीपूर्वक अपने शब्दों का चयन करना होगा। लेकिन उन्हें वे गलतियां नहीं दोहरानी चाहिए, जो उनसे पूर्व के प्रधानमंत्री दोहराते रहे हैं। पश्चिम और चीन के बीच चल रही स्पर्धा में एक स्विंग-पॉवर की तरह भारत का उदय उसे एक बेहतर स्थिति में लाता है और मोदी को इसका लाभ लेना चाहिए।

अप्रैल 2020 में जब जिनपिंग ने एलएसी पर स्थित विवादित क्षेत्रों में सेनाएं भेजी थीं तो उन्हें भारतीय फौज की तरफ से ठोस प्रतिरोध की अपेक्षा नहीं रही होगी। गलवान में हुई लड़ाई में 40 से ज्यादा चीनी फौजियों की मौत की खबर आई थी, जिससे जिनपिंग भड़क उठे थे। जिनपिंग ने एलएसी पर 50 हजार से ज्यादा सैनिकों को तैनात कर दिया था और उन्हें उम्मीद थी कि भारत घुटने टेक देगा। पर भारत ने जवाबी प्रहार करते हुए अपनी तरफ से भी 50 हजार सैनिकों को तैनात कर दिया।

जिनपिंग गलतफहमी में थे कि भारतीय लम्बे समय तक टिक नहीं सकेंगे। लेकिन बीते छह महीनों में चीजें नाटकीय रूप से बदली हैं। चीन की इकोनॉमी टूट रही है। उसका रीयल-एस्टेट सेक्टर ध्वस्त हो रहा है, जो कि उसकी जीडीपी में 32% का योगदान देता था। बड़े रियलिटी डेवलपर्स दिवालिया हो गए हैं। परियोजनाएं अधूरी पड़ी हैं, जबकि घर खरीदने वालों से जबरन ईएमआई वसूली जा रही है। हजारों लोगों ने इसका प्रतिकार करते हुए ईएमआई देना बंद कर दिया है और वे बैंकों के सामने धरना दे रहे हैं।

चीन जैसे देश में इस तरह के दृश्य आम नहीं हैं। मानो इतना काफी नहीं था तो कोविड ने हालत खस्ता कर रखी है। अधिकतर चीनी बुजुर्गों का वैक्सीनेशन नहीं हो सका है और वे ओमिक्रॉन के सामने खतरे की स्थिति में हैं। जिनपिंग की जीरो-कोविड नीति के चलते अनेक शहरों में कठोर लॉकडाउन लगाए गए, जिससे अर्थव्यवस्था को खासा नुकसान हुआ। चीनी की जीडीपी विकास-दर मात्र 3% रह जाने का अंदेशा है।

चीन यूक्रेन में रूस का समर्थन करके यूरोपियन देशों से अपनी दोस्ती को दांव पर लगा चुका है और अमेरिका से तनाव की स्थिति है। चीन के दोस्तों उत्तर कोरिया, पाकिस्तान, तुर्की की दुनिया में कोई खास हैसियत नहीं है। अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी ताकतों और जापान, दक्षिण कोरिया सहित आसियान राष्ट्रों के सम्मुख रूस-चीन धुरी बहुत मजबूत स्थिति में नहीं है। जिनपिंग ताईवान पर हमला बोलने की भी तैयारी कर रहे हैं, लेकिन यूक्रेन में रूस का जो हश्र हुआ, उससे उन्हें सबक सीख लेना चाहिए।

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी हर पांच साल में नेशनल कांग्रेस करती है, जो अगले माह होने जा रही है। इसमें पार्टी के 2300 प्रतिनिधि सम्मिलित होंगे। लेकिन इस बार की कांग्रेस एक मुश्किल अवसर पर हो रही है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)