शेखर गुप्ता का कॉलम:PM मोदी को पार्टी में मौजूद प्रतिभाओं की मदद और विपक्ष को भरोसे में लेना चाहिए, इसके लिए विनम्रता जरूरी होगी

9 महीने पहले
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शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ - Dainik Bhaskar
शेखर गुप्ता, एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

क्या भारतीय राज्यसत्ता विफल हो चुकी है? पत्रिका ‘इंडिया टुडे’ का ऐसा ही मानना है। लेकिन मैं इसका खंडन करना चाहूंगा क्योंकि अगर ऐसा होता तो वह पत्रिका कवर पर इस अर्थ का शीर्षक नहीं लगा पाती। जब तक किसी राष्ट्र का मीडिया, सिविल सोसाइटी और अकेला व्यक्ति भी बुरी खबर देने, शक्तिशाली शासक को आइना दिखाने स्वतंत्र है तब तक हमें विफल राज्य नहीं मान सकते।

तब हम क्या हैं? हम पिटे हुए, कराहते, हताश, भ्रमित, अस्त-व्यस्त, कमजोर नेतृत्व वाले, बर्बादी की कगार पर खड़े हैं। लेकिन जवाब खोज रहे हैं। यह विशेषण ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री लांट प्रिटशेट ने दिए हैं। 2009 में प्रस्तुत शोधपत्र में उन्होंने यह लिखा था, जिसका शीर्षक था, ‘भारत: आधुनिकीकरण के चार लेन वाले हाईवे पर लड़खड़ाता देश’। साल 2009 से 2014 के बीच, भटकी हुई यूपीए-2 के राज में शासन का स्तर बुरी तरह गिर गया था। लड़खड़ाती राज्यसत्ता का फायदा उठाते हुए नरेंद्र मोदी ने ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ के वादे किए, लोगों ने उन पर यकीन कर लिया।

उन्होंने जिस ‘न्यू इंडिया’ का वादा किया था उसमें भी अनिश्चितता, दुविधा की हद हो गई। सात साल तक आर्थिक गतिरोध कायम रहा और उन पर मतदाताओं का भरोसा तब तक बना रहा, जब तक वायरस दोबारा नहीं आया, जिसने असलियत को उजागर कर दिया कि मोदी के सात साल के राज में भारत एक शिथिल तो क्या, एक लड़खड़ाती राज्यसत्ता वाला देश है।

‘राज्यसत्ता’, शीर्ष नेतृत्व, नौकरशाही और वैज्ञानिक प्रतिष्ठान समेत तमाम संस्थाएं आज या तो काम के मोर्चे से गायब हैं या लीपापोती में और किसी तरह अपनी छवि चमकाने में लगे हैं। हर नेता की अपनी ब्रांड छवि होती है। मोदी की ब्रांड छवि में प्रशासनिक क्षमता, जनकल्याण योजनाओं को कुशलता से लागू करना भी शामिल है। इसकी मिसाल हम सात साल में देख चुके हैं, खासकर गरीब आबादी को लाभ पहुंचाने और इन्फ्रास्ट्रक्चर के मामलों में। लेकिन बुनियादी शासन की नींव को मजबूत करने का काम नहीं किया गया।

संस्थाओं और केंद्रीय मंत्रिमंडल को कमजोर किया गया। यदि यह सामान्य मंत्रिमंडलीय संस्था की तरह काम करता तो कुशल मंत्रियों को संकट से मुकाबले की जिम्मेदारियां देते। जो ज़िम्मेदारी नहीं निभा पाते उन्हें बाहर करते। राजनीति को तरजीह नहीं दी जाती। 1962 में पराजय के बाद नेहरू ने रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन को बर्खास्त कर दिया था और उनकी जगह यशवंत राव चह्वाण को लाए थे।

लाल बहादुर शास्त्री को नेहरू से विरासत में खाद्य संकट मिला। मुकाबले के लिए उन्होंने सी. सुब्रह्मण्यम को कृषि मंत्री नियुक्त किया। 1991 में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने एक अराजनीतिक मनमोहन सिंह को वित्त मंत्रालय की ज़िम्मेदारी सौंप दी थी। यह सब बताने का अर्थ यह है कि व्यक्तियों का महत्व नहीं है, मुद्दों का है। इसलिए हम उन अहम मुद्दों की सूची बनाएं जिन्होंने सख्त फैसलों को मुमकिन बनाया।

  • ईमानदारी से यह कबूल किया गया कि गलती हुई है।
  • शीर्ष नेतृत्व को सुरक्षा में डालने का दबाव नहीं था।
  • एक नेता को सारा श्रेय देने की मजबूरी नहीं थी।
  • इन अवसरों पर चापलूसी की शक्तिशाली प्रवृत्ति हावी नहीं थी। तब ट्विटर वगैरह नहीं थे लेकिन इंदिरा गांधी के राज में हमने अविश्वसनीय चाटुकारिता के दौर भी देखे।

मंत्री बेदाग छूट रहे हैं और प्रधानमंत्री ने जिस तरह कदम पीछे खींच लिए हैं, उनसे संकट गंभीर होता जा रहा है। सामूहिक इनकार और सच कहने से तमाम संस्थाओं के परहेज के कारण ही इस अकल्पनीय संकट का पहाड़ टूट पड़ा है। यह वक्त विनम्रता दिखाने का है। तभी व्यापक राष्ट्रीय सद्भाव और एकजुटता स्थापित हो सकती है।

कहां है विनम्रता?
प्रधानमंत्री मोदी को पार्टी में और दूसरी जगह मौजूद प्रतिभाओं का सहयोग व विपक्ष को भरोसे में लेना चाहिए। यह आग बुझाने के लिए केंद्र व राज्यों में संयुक्त संघीय मोर्चा का गठन करना चाहिए। यह करने के लिए पहले विफलता को कबूल करें या न करें, संकट की भयावहता कबूल करना पड़ेगी। इसके लिए एक ही गुण की जरूरत होगी, जो अब तक नहीं दिखा है। वह है, विनम्रता।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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