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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:पल दो पल जले जो हम वो दिया मांगते हैं, आपके हैं आपसे दया मांगते हैं

15 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

चार्ली चैपलिन की फिल्म ‘द किड’ का प्रदर्शन सन 1921 में हुआ था। अगर यह महामारी का दौर ना होता तो पूरे विश्व में इस महान फिल्म के प्रदर्शन का शताब्दी समारोह आयोजित किया जाता। यह फिल्म मानवीय करुणा का सेल्यूलाइड पर लिखा महाकाव्य माना जाता है। चार्ली चैपलिन फिल्म विधा के महान गुरु की तरह माने जाते हैं।

कथासार यह है कि एक युवती का प्रेमी शादी करने से इंकार कर देता है। युवती बच्चे को जन्म देती है परंतु उसका पालन-पोषण करने में स्वयं को असमर्थ पाती है। सदियों से ऐसे बच्चों को नाजायज कहा जाता है जबकि मां-बाप ही नाजायज होते हैं जो प्रेम तो करते हैं परंतु उसके निर्वाह का उत्तरदायित्व नहीं लेना चाहते।

दुविधाग्रस्त मां बच्चे को एक कार में रख देती है। उसे पछतावा होता है परंतु जब वह लौटती है तो कार कहीं और जा चुकी होती है। कार चलाने वाले को ज्ञात भी नहीं कि कार में कोई बच्चा छोड़ गया है। फिल्म का नायक कार में बच्चे के रोने की आवाज सुनता है। नायक बेरोजगार युवा है। वह कार से बच्चा अपने टूटे-फूटे मकान में ले आता है।

वह खुद भूखा रहकर बच्चे के लिए दूध खरीदता है। चार्ली चैपलिन अभिनीत बेरोजगार युवा किसी तरह अभावों से जूझते हुए बच्चे को बड़े प्यार से पालता है? चार्ली खिड़कियों में शीशे लगाने का काम जानता है। बच्चा अवसर देखकर किसी भी घर की खिड़की के शीशे पर पत्थर फेंककर भाग जाता है। थोड़ी देर पश्चात चार्ली उधर आता है और खिड़की में नया शीशा लगाकर पैसे कमाता है। चार्ली और किड का यह काम सफल होता है।

अब वह दो वक्त का भोजन कर पाते हैं। इस बीच युवती फिल्मों में अभिनय करके अत्यंत लोकप्रिय सितारा बन जाती है। वह एक भव्य बंगले में रहती है। दूसरी ओर उसका बच्चा एक ढहते हुए मकान में अभाव का जीवन जी रहा है। एक ओर सफलता और वैभव है तो दूसरी ओर साधनहीनता है परंतु चार्ली और किड एक-दूसरे को बहुत प्यार करते हैं।

कहीं पैसा है, कहीं प्यार है। लोकप्रिय सितारा अनाथालय जाकर संस्थाओं को दान देती है। कुछ अवसर ऐसे भी आते हैं जब मां और पुत्र निकट से गुजरते हैं परंतु उनकी मुलाकात नहीं होती। मिलना बिछड़ जाना, फिर मिलकर भी नहीं मिलना जीवन यात्रा के हिस्से हैं।

एक बार दो बच्चे बेबात झगड़ा करते हैं। कमजोर सा दिखने वाला गरीब अनाथ साधन संपन्न परिवार के बच्चे की पिटाई कर देता है। कुछ क्षण बाद पिटा हुआ बच्चा अपने साथी लाकर अकेले पड़ गए गरीब बच्चे को पीट देता है। चार्ली एक बनाम अनेक के झगड़े में कूदकर साधन संपन्न बच्चे के साथियों को पीटता है। अमीर बच्चे का बड़ा भाई चार्ली की जमकर पिटाई कर देता है। इस प्रसंग के आईने में आप साधन संपन्न और साधनहीन के सदियों से चले आ रहे असमान और अन्याय आधारित व्यवस्था का पूरा इतिहास देख सकते हैं।

बहरहाल इस कारण हुई मारपीट को सितारा मां आकर रोकती है। बच्चे के बीमार पड़ने पर वह उसका इलाज अपने डॉक्टर से कराती है। इस घटना के कारण व्यवस्था बच्चे को अनाथ आश्रम ले जाती है। याद आता है कि ‘बूट पॉलिश’ में अनाथ आश्रम के बच्चे आम सड़क पर गीत गाते हुए चंदा एकत्रित करते हैं।

गीत की एक पंक्ति है- ‘किसी शाम पल दो पल जले जो हम वो दिया मांगते हैं, आपके हैं आपसे दया मांगते हैं....’ गरीब व्यक्ति ने इतना कुछ सहा है कि अपनी प्रार्थना में भी वह पल दो पल जल सकने वाला दिया ही मांगता है। बहरहाल चार्ली चैपलिन अनाथालय से अपने बच्चे को लेकर भाग जाता है।

बच्चे के बीमार पड़ने पर उसे सितारे के डॉक्टर के पास ले जाते हैं। डॉक्टर किड और सितारा के चेहरों का साम्य देखता है। कुछ परीक्षणों के बाद यह सिद्ध हो जाता है कि ये बच्चा सितारा बन गई मां का ही पुत्र है। ढहते हुए मकान में परवरिश पाने वाला किड अब महलों में आ गया है, परंतु चार्ली के बिना जी नहीं सकता। फिल्म सुखांत है। मानवीय करुणा के यह दस्तावेज विश्व सिनेमा की धरोहर हैं। ‘द किड’ से प्रेरित महमूद की फिल्म ‘कुंवारा बाप’ और दक्षिण में बनी ‘नन्हा फरिश्ता’ है।

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