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एन. रघुरामन का कॉलम:पैसा हमेशा दूसरों के लिए खुशी नहीं खरीद सकता है, लेकिन हमारा उदार व्यवहार और मीठे बोल ऐसा कर सकते हैं

5 महीने पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

गुरुवार को दोपहर में कोविड वैक्सीन लगवाने के बाद मैं रात को भोपाल से मुंबई जाने के लिए ‘बूथवाला फ्लाइट’ (देर रात) में बैठने जा रहा था। रात 8.30 बजे तक मुझे कुछ असहजता महसूस होने लगी। जिस हाथ में वैक्सीन लगी थी, उसमें दर्द होने लगा। हालांकि जब प्रशिक्षित नर्स नेहा ने मुझे इंजेक्शन लगाया था, मुझे जरा भी दर्द नहीं हुआ था।

एयरपोर्ट के रास्ते में, मैंने अपने ड्राइवर विकास मेहर से नए राजा भोज पुल के पास, श्यामला हिल्स स्थित ‘ज़ेन मेडिकल कॉर्नर’ पर रुकने को कहा। कार रुकते ही मैं तुरंत बाहर आया क्योंकि वह तंग जगह थी और पुलिस वहां पार्किंग की अनुमति नहीं देती। दूरी बनाए रखने के लिए दुकान के काउंटर के सामने बांस लगे थे। मुझसे पहले दो ग्राहक और थे।

मुझे बाद में अहसास हुआ कि मैं उदार या सज्जन ग्राहक नहीं था। मेरे हावभाव से स्पष्ट था कि मुझे जल्दी है और मैं बस दो पेरासिटामोल गोलियां चाहता था, जिन्हें जरूरत पड़ने पर फ्लाइट में ले सकूं। दुर्भाग्यवश उस जल्दबाजी ने मुझे थोड़ा अशिष्ट बना दिया और मैंने अपनी बारी का इंतजार नहीं किया। मैं दूसरे ग्राहक के पीछे खड़े होकर जरा ऊंची आवाज में बोला, जो दुकान मालिक पसंद नहीं आया। उनके चेहरे पर नाराजगी थी।

मैंने तुरंत लहजा सुधारा और एयरपोर्ट इमरजेंसी तथा पार्किंग समस्या बताते हुए दो पैरासिटोमोल गोलियां देने का निवेदन किया। दुकान पर मौजूद एक युवक, जो शायद मालिक का बेटा होगा, गोलियों का नया पत्ता निकालकर, उसमें से दो गोलियां काटने लगा। तभी पिता ने, जो लगभग 60 वर्ष के होंगे, उसे रोका और कहा कि दराज में दो गोलियां हैं। मुझे अच्छा लगा कि दुकान पर जो भी हो रहा है, उसे लेकर वे सजग थे।

लड़के ने जब गोलियां दीं तो मैं उनपर एक्सपायरी डेट देखने लगा, जिससे मेरा व्यवहार थोड़ा अलग हो गया। मुझे ऐसा करता देख वे बुजुर्ग व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ बोले, ‘फ्रेश है।’ मुझे थोड़ा अजीब लगा और मैंने गोलियां जेब में रखीं और बटुए से 50 रुपए निकालकर दिए। वे मुझे देखकर फिर मुस्कुराए, जिसका मतलब लग रहा था, ‘कहां से आया है भाई।’ उन्होंने शांति से कहा, ‘मुझे सिर्फ दो रुपए चाहिए और अगर अभी नहीं हैं तो अगली बार जब यहां से निकलेंगे तब दे दीजिएगा।’

मैं खुद अपने भाव बयां नहीं कर सकता। मैं बहुत छोटा महसूस कर रहा था। मैं चुपचाप जाकर कार में बैठ गया और दुकान मालिक से हुआ बात विकास को बताई, जो उन बुजुर्ग के व्यवहार से अभिभूत था। उसने तुरंत जवाब दिया, ‘मेरे पास दो रुपए हैं। आपको छोड़कर लौटते में मैं उनको दे दूंगा और कहूंगा कि आपने भेजे हैं।’ विकास की बात मेरे लिए एक और झटका थी। मैं सोच रहा था कि लोग कितने उदार हो सकते हैं, खासतौर पर निम्न आय वर्ग के लोग।

अगले 20 मिनट में पूरे घटनाक्रम, अपनी गलती, उन लोगों की उदारता के बारे में सोचता रहा और मानवता की सराहना में इतना डूब गया कि विकास को वो 50 रुपए देना भूल गया। मुझे इसका अहसास तब हुआ जब विकास ने फोन कर बताया कि उसने मेडिकल वाले को दो रुपए दे दिए हैं। फंडा यह है कि पैसा हमेशा दूसरों के लिए खुशी नहीं खरीद सकता है, लेकिन हमारा उदार व्यवहार और मीठे बोल ऐसा कर सकते हैं।