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मुकेश माथुर का कॉलम:भारत की कौन-सी बात दुनिया को सुनाना चाहते हैं यह हम कर सकते हैं तय

20 दिन पहले
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मुकेश माथुर, स्टेट एडिटर, दैनिक भास्कर, राजस्थान - Dainik Bhaskar
मुकेश माथुर, स्टेट एडिटर, दैनिक भास्कर, राजस्थान

‌मैं- उस भारत से आता हूं, जहां पद्मश्री से नवाजे जाते ही सिनेमा की एक नायिका सरकार की चापलूसी में इतनी आगे बढ़ जाती है कि आजादी के लिए जान देने वालों का अपमान कर बैठती है। एक बड़ा वर्ग जल्द ही इस बयान को देश की एकता, अखंडता और लोकतांत्रिक मूल्यों को तहस-नहस कर देने वाला करार देता है और यह नायिका देश की सबसे बड़ी खलनायिका बन जाती है।

मैं उस भारत से आता हूं जहां उक्त बयान के कुछ ही दिन बाद अमेरिका के प्रसिद्ध जॉन एफ कैनेडी सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स में एक स्टैंड-अप कॉमेडियन के दिन में पूजा, रात में दुष्कर्म के बयान को यही वर्ग कटाक्ष और ‘स्टैंड लेने वाला’ बताता है।‘एक ही भारत’ में दो कलाकारों के बयान अलग-अलग तरह से लिए जा रहे हैं। दोनों वाहियात बयानों से गंभीर बात यह कि अपनी विचारधारा को जंचने वाले किसी एक बयान को वैधता दी जा रही है।

उक्त नायिका ने अपने हर अगले बयान से अपना स्तर थोड़ा और नीचे गिराया है, यह सभी जानते हैं। उसकी प्रतिस्पर्धा अब अपनी ही पिछली गिरावट से है। फिर भी अगर कोई 2014 में आजादी मिलने की बात में तार्किकता तलाश रहा है, उसे इस भक्ति के बदले पद्मश्री तो मिलने से रहा। अच्छा हो कि स्कूल में पढ़े आजादी के पाठ और सन 47 के नायकों के प्रति श्रद्धा रखें। कैनेडी सेंटर में कॉमेडियन के एक्ट को भी वीरता बताया जा रहा है।

विदेशी धरती पर देश की विद्रूपताएं बयां करना वीरता नहीं मार्केटिंग है। यह कलाकार भी उसी भीड़ का हिस्सा है जिसे पता है अंग्रेज भारत को लेकर जो धारणाएं बना गए थे, वह अब भी कायम है और वही बिकती हैं। सांप, झुग्गी, गरीबी, अपराध यानी भारत। स्लमडॉग मिलेनियर को भारत की गरीबी बेचने पर ऑस्कर मिल सकता है, तो एक स्टैंड-अप कॉमेडियन को दुष्कर्म वाला देश बताने पर तालियां मिल ही जाएंगी।

विरोध होने पर स्पष्टीकरण में इस कॉमेडियन ने कहा कि वह दो भारत की बात कर रहा था और कैसे सब मुद्दों के बावजूद भारत महान है, यह बता रहा था। बाकी देशों की तरह हमारे देश में भी बहुत सारी दिक्कतें हैं। जैसे अमेरिका को 2021 में भी ब्लैक लाइव्स मैटर का अभियान चलाना पड़ता है, उसी तरह हम भी कुछ भयावह सामाजिक दिक्कतों से निबटने में लगातार जुटे हुए हैं। दुष्कर्म के केस अमेरिका में हमसे कहीं ज्यादा हैं।

लेकिन दुष्कर्म कोई आंकड़ा नहीं राष्ट्रीय शर्म है जिससे निपटना देश-समाज की चुनौती है। सही कह रहे हैं कई बुद्धिजीवी, ये कलाकार हैं, इनके कहे, किए से देश का लोकतंत्र बिल्कुल कमजोर नहीं होगा। इनकी गलतबयानी को समान रूप से खारिज करें या नजरअंदाज करें यह रास्ता हमारे पास है। लेकिन सोशल मीडिया के इस युग में बोली हुई बात दूर तलक जाती है, धारणाएं बनाती, जनमत तैयार करती है, सरकारें बनाती-बिगाड़ती है।

इसलिए बयानों को सिलेक्टिव रूप से चतुराई के साथ अपने एजेंडे के लिए इस्तेमाल करना अपराध जैसा है। फिर चलिए, इतना दूर की न भी सोचें तो पूरब-पश्चिम के उस गाने को ही गुनगुना लें- ‘है प्रीत जहां की रीत सदा, मैं गीत वहां के गाता हूं… भारत का रहने वाला हूं, भारत की बात सुनाता हूं।’ भारत की कौन-सी बात दुनिया को सुनाना चाहते हैं यह हम तय कर सकते हैं।