एन. रघुरामन का कॉलम:अच्छा ज्ञान चाहिए तो पास होने के साथ-साथ जरूरी है सीखना

13 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

हमारे देश में बच्चों की पढ़ने की बुनियादी क्षमता घटकर 2012 से पहले के स्तर पर आ गई है। यह मैं नहीं कह रहा, एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट 2022 ने इसे रेखांकित किया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक यह गिरावट निजी-सरकारी दोनों तरह के स्कूलों और लड़कों-लड़कियों में समान रूप से देखी गई है।

कल्पना कीजिए कि पहली कक्षा के लगभग 43.9% बच्चे एक पत्र नहीं पढ़ पाते हैं। उसी कक्षा के 37.6% बच्चे 1 से 9 तक के अंकों को नहीं पढ़ सकते। वहीं केवल 12% ही एक पूरे शब्द को पढ़ने में सक्षम हैं। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक छह साल का बच्चा 1 अंक और ए अक्षर नहीं पढ़ सकता, जबकि हमारे आसपास मौजूद अधिकतर मांएं गर्व से बताना चाहती हैं कि उनका बच्चा क्या-क्या कर सकता है!

मैं आपको एक और हैरान कर देने वाली सूचना देता हूं। आज कॉलेजों में अधिकतर होमवर्क चैटबॉट, चैटजीपीटी, जिटहट, कोपायलट या ब्लैकबॉक्स के द्वारा लिखा जाता है। ये तमाम अमेरिकी खुफिया एजेंट्स हैं, जो वर्चुअल रूप से हमारे स्मार्टफोन या लैपटॉप में उपलब्ध हैं। मैं इसे कंट्रोल सी और कंट्रोल वी यानी कॉपी-पेस्ट जनरेशन कहता हूं। यह कॉपी-पेस्ट मैथड उनके कॅरियर को बेपटरी कर सकता है।

यही कारण है कि विकसित देशों ही नहीं भारत के भी अनेक विश्वविद्यालय इस सेमेस्टर से पाठ्यक्रमों में बदलाव ला रहे हैं। इसके चलते स्टूडेंट्स को होमवर्क का पहला ड्राफ्ट क्लासरूम में लिखना होगा और सम्बंधित प्राध्यापक द्वारा उसकी रैंडम चेकिंग की जाएगी। यह बच्चों को एआई के इस्तेमाल से रोकने के लिए है, जो सृजनात्मकता को बाधित करती है।

आईआईटी जैसे संस्थानों में नए प्रोग्रामर्स को गूगल पर नि:शुल्क उपलब्ध टूल्स का इस्तेमाल करने से हतोत्साहित किया जा रहा है। रिक्रूटर्स यह पता करने के लिए अपने कैंडिडेट्स के दिमाग की गहरी छानबीन कर रहे हैं कि उन्हें कितना डीप नॉलेज है। अगर आप पैरेंट्स हैं तो शिक्षकों के पास इस बात की लड़ाई करने न जाएं कि आपके बच्चे को पड़ोसी के बच्चे से कम अंक क्यों मिलते हैं।

अगर आप टीचर को किसी सब्जी बाजार या शॉपिंग मॉल में देखें तो जोर से उनका नाम न पुकारें। क्योंकि वहां पर वे एक भिन्न भूमिका में हैं। पैरेंट-टीचर मीटिंग में उपस्थित रहें और टीचिंग की प्रणाली में गलती खोजने के बजाय अपने बच्चे की सीखने की क्षमताओं के बारे में सवाल पूछें। बच्चा कॉलेज से आए तो उसने क्या सीखा, इस बारे में उससे बातें करें। अगर आपको लगता है कि कुछ टीचर्स अच्छे नहीं हैं तो यह आपकी भूल है।

आपने इंफ्रास्ट्रक्चर देखा था और भव्य इमारतों और ब्रांडेड कम्प्यूटर लैब्स को देखकर बहुत खुश हुए थे, लेकिन यह जानने की कोशिश नहीं की थी कि शिक्षक कितने योग्य हैं और वे कैसे पढ़ाते हैं। न ही आपने पूर्व छात्रों से बात की थी। हमारे जैसे एजुकेटर्स के लिए तो बड़ी मुसीबत की स्थिति है। स्तरहीन शिक्षा से देश आने वाले कल में बेहतर नहीं बन सकता।

बच्चों को अपनी पसंद की कोई चीज सीखने का समय दें, और उन्हें उस क्षेत्र में महारत पाने का अवसर मुहैया कराएं। यह मुझे एक श्लोक की याद दिलाता है, जो इस प्रकार है : नरस्याभरणं रूपं रूपस्याभरणं गुणः। गुणस्याभरणं ज्ञानं ज्ञानस्याभरणं क्षमा॥ अर्थात्, नर का आभूषण सुंदरता है, गुणवत्ता सुंदरता का आभूषण है, ज्ञान गुणवत्ता का व धैर्य ज्ञान का आभूषण है।

फंडा यह है कि अगर आपको अच्छा ज्ञान चाहिए, तो सबसे पहले आपको उसे सीखने के लिए धैर्य की जरूरत है। तुरत-फुरत में पास हो जाने से कोई ज्ञानवान नहीं बन जाता।