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एन. रघुरामन का कॉलम:इंटेलिजेंस बढ़ाने के लिए हर नुक्कड़ में दावत होनी चाहिए!

12 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

रविवार दोपहर दिल्ली एयरपोर्ट पर 50 से ज्यादा यात्रियों को विमान के नजदीक बस में 20 मिनट रुकना पड़ा क्योंकि हाउसकीपिंग स्टाफ ने विमान साफ नहीं किया था। गर्मी से यात्री परेशान थे। इस दौरान एक और बस दूसरे लॉट के 30 यात्रियों को लाई और पहली बस के पीछे खड़ी हो गई। इस बीच विमान प्रस्थान के लिए तैयार था और ग्राउंड स्टाफ को निर्देश थे कि पहले, दूसरे नंबर का दरवाजा खोलें क्योंकि वहां कोई वीआईपी यात्री था। वह बहुत साफ-सुथरे रंगीन कुर्ते-पायजामे, हाफ जैकेट में थे और बेहद स्मार्ट दिख रहे थे, जिससे कई लोगों की निगाहें उन पर टिक गई थीं। इस तथाकथित ‘फेवरेटिज़्म’ के कारण पहली बस के कई यात्री खीझ गए और शिकायतें शुरू कर दी पर 30 सेकंड बाद ही उनकी बस का गेट भी खुल गया और वे सब उन स्मार्ट दिख रहे वीआईपी, जो कि सीढ़ियां चढ़ने ही वाले थे, उनको पीछे छोड़ने के लिए भागे। चूंकि यात्रियों ने जल्दबाजी दिखाई तो वह रुक गए और इत्तेफाक से भीड़ में उन्हें एक दोस्त मिल गया और उससे बातें करने लगे, ताकि बाकी यात्री पहले सवार हो जाएं। बोर्डिंग पूरी होते ही वह वीआईपी पैसेंजर आखिरी में लास्टमैन की तरह आकर मेरे बाजू में बैठ गए। वह केंद्र के जल शक्ति मंत्रालय में केबिनेट मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत थे, जो कि राजस्थान में जोधपुर लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं। हमने तुरंत राजनीति व देश में पानी के भविष्य पर बात शुरू कर दी। उस पूरे 90 मिनट की बातचीत में उनके मुंह से निकला हर शब्द अपनी गति में शांत बहती नदी की तरह था, जिसे पता हो कि कहां जाना है। उन्होंने विरोधियों पर कोई भी हल्की टिप्पणी नहीं की और उन्हें ‘जी’ कहकर संबोधित किया। उनका मंत्रालय जो कुछ भी कर रहा है, उन्होंने उसका सारा श्रेय प्रधानमंत्री को दिया। पत्रकार होने के नाते जब मैंने बढ़ती आबादी की वजह से भविष्य में पानी की उपलब्धता पर डरावने आंकड़े सामने रखे, तो वह उसी स्मार्ट तरीके से मुस्कुराए जैसे स्मार्ट कपड़े पहने थे और आंकड़ों के साथ जवाब देते हुए नदी जैसे शांत थे, जिसमें गहरा विश्लेषण था, जिसे मैं अपने आगामी कॉलम्स में लिखूंगा। उन्होंने कहा कि दुनिया की 17.5% आबादी भारत में होने के बावजूद हमारा घरेलू पानी का इस्तेमाल सिर्फ 5% है, औद्योगिक इस्तेमाल में 6% है जबकि 89% पानी सिंचाई में जाता है। इसी क्षेत्र में पानी की बर्बादी मैनेज करने की जरूरत है, उन्होंने जोड़ा कि ‘हमारे यहां पानी की वास्तविक समस्या नहीं है और मंत्रालय को घरेलू इस्तेमाल के लिए कम से कम निकट भविष्य में जल संकट नजर नहीं आता क्योंकि हम अगले दो-तीन दशक के लिए ब्लूप्रिंट तैयार कर रहे हैं। हमें रोजमर्रा की जीवनशैली में जो चीज अमल में लाने-आदत डालने की जरूरत है, वो है जल प्रबंधन ना कि पानी को लेकर घबराने की।’ हमारी चर्चा मप्र-उप्र के बीच पानी के एग्रीमेंट से लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु, गुजरात सरोवर प्रोजेक्ट और कई मुद्दों पर होती रही। उन्हें पूरा विश्वास था कि भारत अच्छी प्रबंधन पद्धतियों के साथ भविष्य की पानी की मांग को आसानी से पूरा कर सकता है। उन्होंने साफ-साफ कहा कि ‘यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम एक तय जीवनशैली अपनाएं, जिसमें पर्यावरण का सम्मान हो और प्रकृति की रक्षा में खुद को पूरी तरह समर्पित करें।’ पहले मुझे वो 90 मिनट की बातचीत नुक्कड़ की किसी गपशप की तरह लग रही थी लेकिन जब विमान से उतरा तो वो मेेरी आंखों, कानों और दिमाग के लिए एक ट्रीट की तरह साबित हुई। फंडा यह है कि हर गली-नुक्कड़ अगर गप्पों की जगह ऐसी ट्रीट में बदल जाए, तो यह बुद्धि के अगले स्तर तक ले जाने में मदद करेगा।