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एन. रघुरामन का कॉलम:जरूरतमंदों से अपनी चीजों का बहुत छोटा-सा हिस्सा शेयर करने से जिंदगी खूबसूरत हो जाती है

16 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

परोपकाराय फलन्ति वृक्षा:, परोपकाराय वहन्ति नद्य:, परोपकाराय दुहन्ति गावः, परोपकारार्थम् इदं शरीरम्॥ अर्थात्, वृक्ष परोपकार के लिए फल देते हैं, नदियां बहती हैं, गाएं दूध देती हैं, इसी तरह से हमारे शरीर को भी दूसरों के हित के लिए जीवित रहना चाहिए। स्कूल के दिनों में सिखाया ये श्लोक कल मुझे याद आ गया, जब मैंने पढ़ा कि मुंबई के सिविल अस्पतालों में मरीजों के भोजन से दूध हटा दिया गया है, क्योंकि सरकार की मदद से संचालित होने वाली आरे डेयरी ने किल्लत का हवाला देते हुए अस्पतालों को दूध की आपूर्ति बंद कर दी है।

मुंबई के चार बड़े अस्पतालों, 16 छोटे अस्पतालों, 30 मैटर्निटी होम्स में हर दिन 4000 लीटर दूध की खपत है। आरे डेयरी 39 रु. प्रति लीटर की सब्सिडाइज्ड दर पर इसकी आपूर्ति करती थी। डेयरी को राज्य के ग्रामीण इलाकों से दूध मिलता है, फिर वह इसे संसाधित-वितरित करती है। आरे का कहना है कि सप्लाई-चेन में बाधा आई, क्योंकि विक्रेताओं को निजी वेंडरों से दूध की बेहतर कीमत मिल रही है।

निजी सहकारी डेयरियां मवेशियों के मालिकों को 39-40 रु. प्रति लीटर पे कर रही हैं, जबकि सरकार 27 रु. देती है। तो आपूर्तिकर्ता निजी कम्पनियों को प्राथमिकता देने लगे। इससे किल्लत हुई। पर इससे अस्पताल मुश्किल में हैं, क्योंकि करीब 80 हजार मरीज दूध से वंचित हो गए हैं। चूंकि दूध का कोई विकल्प नहीं, इसलिए अस्पताल जूझ रहे हैं। मरीजों में बच्चे-गर्भवती महिलाएं भी हैं।

साथ ही ऐसे मरीज भी हैं, जिन्हें नैसोगेस्ट्रिक ट्यूब से नाक के जरिए भोजन दिया जाता है। उन्हें दूध की सख्त जरूरत है। अस्पताल जनहितैषियों से अनुदान की मांग कर रहे हैं, साथ ही मरीजों के भोजन में दूध देते समय वे बच्चों-गर्भवती महिलाओं को प्राथमिकता भी देने लगे हैं। ऐसे हालात में सायन अस्पताल ने 64 साल की समाजसेविका भारती सांगोई से संपर्क किया। बीते तीन दशकों से वे अस्पताल के लिए एक सम्माननीय नाम रही हैं।

जब भी मेडिकल सप्लाई की जरूरत होती है या सर्जरी आदि में पैसों की कमी होती है तो मदद के लिए सबसे पहले उन्हीं को याद करते हंै। जब अस्पताल ने उन्हें इस नई समस्या के बारे में बताया तो उन्होंने मात्र एक घंटे में 600 लीटर दूध एकत्र करवा दिया। अस्पताल की रोज की जरूरत 800 लीटर की थी। तब से वे गंभीर स्थिति वाले मरीजों को रोज 300 लीटर से ज्यादा दूध मुहैया करवा रही हैं। उन्होंने अपने से जुड़े वॉट्सएप्प समूहों को एक ‘सेव अवर सोल’ (एसओएस) मैसेज भेजा और इस कमी की भरपाई की।

जब मैंने भारती के बारे में यह पढ़कर अपनी आंखें कार के शीशे की तरफ उठाईं तो सामने फुटपाथ पर दो गरीबों को देखा। उनमें से एक महिला थी और वह एक व्हीलचेयर थामे थी, जिस पर दूसरा व्यक्ति बैठा था। वे भीख मांग रहे थे और एक आवारा कुत्ता भी उनके साथ था। जब वे खाना खाने लगे तो कुत्ता आशाभरी नजरों से देखने लगा, मानो कह रहा हो, मुझे मत भूल जाना। वे उसका इशारा समझ गए और अपने बर्तनों से उसे भी खाना दिया।

मेरे चेहरे पर तब मुस्कान आ गई, जब वे इस बात से खुश होकर हंसने लगे कि अब कुत्ता भूखा नहीं रहेगा। इससे एक छोटा-सा सबक मिला- आप जो भी हों, आपके पास जो कुछ भी हो, उसे अपने से कमनसीब लोगों से साझा करें। जब प्रकृति मनुष्यों से सबकुछ बांटती है तो क्या हम उसका थोड़ा-सा हिस्सा दूसरों को नहीं दे सकते? और कुछ नहीं तो ईश्वर ने हमें हर दिन जो 24 घंटे दिए हैं, उनमें से कम से कम चंद मिनट तो सेवाकार्य के लिए दे ही सकते हैं।

फंडा यह है कि जब हम जरूरतमंदों से अपनी चीजों का बहुत छोटा-सा हिस्सा भी शेयर करते हैं तो जिंदगी खूबसूरत हो जाती है।