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एन. रघुरामन का कॉलम:विचार को बुद्धि के खेल की तरह स्वीकारने से कुछ ऐसा मिल सकता है, जो जीवनभर का खजाना बन जाए

5 महीने पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

कई वर्ष पहले मैं तमिलनाडु के कोयंबटूर से 60 किमी दूर एक गांव में बेसब्री से टैक्सी का इंतजार कर रहा था। मुझे शहर जाना था, पर टैक्सी नहीं आई। मुझे देर हो रही थी इसलिए मैं लोकल बस में चढ़ गया जो ट्रक से भी बदतर थी। मैं बिना गद्दी वाली लकड़ी की सीट पर अकेला बैठा पछता रहा था और टैक्सी ड्राइवर पर गुस्सा आ रहा था।

किस्मत को कोसते हुए मैंने कहा, ‘कहां फंस गया!’ बस कई जगह रुकी, जहां कुछ लोग उतरते और ज्यादा चढ़ जाते। करीब 20 किमी बाद सारी सीटें भरी थीं, सिर्फ मेरे बगल वाली खाली थी। अचानक कंधे पर कपड़े की गठरी लटकाए एक बुजुर्ग महिला ने मुझे खिड़की की ओर खिसकने कहा और बैठ गईं। वे मेरी तरफ देख मुस्कुराईं, पर मैं उसी उत्साह से जवाब नहीं दे सका।

लेकिन जब भी हमारी नजरें मिलतीं, वे मुस्कुरा देतीं। उन्होंने गठरी कसकर पकड़ी थी, जैसे उसमें गहने हों। तब मेरे अंदर का पत्रकार जागा और मैंने बात शुरू की। दरअसल उनकी गठरी का कीमती सामान कॉटन की ‘नेगामम’ साड़ियां थी, जिन्हें उन्होंने 85 वर्षीय पति के साथ बुना था। वे महीने में दो बार ये साड़ियां कोयंबटूर के कपड़ा बाजार ले जाती थीं। इन साड़ियों को तमिल में ‘गेट्टी रागम’ कहते हैं, यानी ‘मोटी वैरायटी’।

एक साड़ी को हाथ से बुनने में एक हफ्ता लगता है। स्थानीय 15 कोऑपरेटिव द्वारा सप्लाई की जाने वाली साड़ियों की कीमत को-ऑप्टेक्स में 2500 रुपए तक होती है। मुझे यह पसंद आई क्योंकि यह साड़ी आठ गज की थी, जो इसे बाकी साड़ियों से अलग बनाती है क्योंकि इससे महिलाएं ज्यादा चुनटें (प्लीट) बना पाती हैं, जिससे वे आसानी से, तेज चल पाती हैं।

साड़ियों की खूबसूरती बॉर्डर पर रंगों और मुख्य भाग में डिजाइन के अलावा चुनटों से भी होती है। इन साड़ियों की गुणवत्ता वर्षों बनी रहती है और रंग भी फीके नहीं पड़ते। मैं बस से उतरा तो लगा कि मैंने साड़ी पर क्रैश कोर्स कर लिया, वह भी मुफ्त। हम जानते हैं कि हर सवाल का जवाब होता है और हर समस्या का हल। लेकिन कई लोग यह नहीं समझते कि अस्त-व्यस्तता के बाद ही स्पष्टता आती है।

जब आपको जवाब मिल जाता है तो आप पहले से अधिक परिपक्व हो जाते हैं। या तो आपको अनुभवों से परिपक्वता मिलती है या किसी बुजुर्ग की मदद से। जब आप बाहरी की बजाय पहले खुद की बुद्धिमत्ता पर निर्भर होते हैं तो आप गड़बड़ी और भ्रम भरे बदलाव से नहीं बच सकते, जैसा मेरे साथ बस में हुआ। जैसे ही 80 वर्षीय बुजुर्ग महिला ने साड़ी के विषय पर अपनी बुद्धिमत्ता साझा करना शुरू की, मेरे मन का विस्तार होने लगा।

तब मुझे एहसास हुआ कि जब आप किसी विचार को अकादमिक सोच के साथ देखते हैं, जो हमेशा हर सवाल का सही जवाब चाहती है, तब आपको बढ़ने और नई चीजें जानने की प्रक्रिया का आनंद नहीं मिल पाता। तब से मुझे हमेशा भ्रम, थोड़ी नासमझी में आनंद आता है और मैं कभी किस्मत को नहीं कोसता। अब मैंने यह कहना सीखा है, ‘ईश्वर चाहते हैं कि मुझे यह अनुभव भी हो।’

फंडा यह है कि जब आप विचार को बुद्धि के खेल की तरह स्वीकारते हैं, तो आपको शायद वह खजाना न मिले, जिसे तलाश रहे हैं, लेकिन आपको कुछ ऐसा मिल सकता है, जो जीवनभर का खजाना बन जाए। जैसे मुझे साड़ी की कहानी जानने मिली।