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एन. रघुरामन का कॉलम:कम व बेहतर खरीदने की वकालत करना लगता है घिसा-पिटा, लेकिन इससे बदल जाता है हमारे कपड़े पहनने और खरीदने का तरीका

4 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

फैशन के मामले में 2022 का स्लोगन बदल गया है ‘कम खरीदें, अच्छा खरीदें’, 2021 में ये ‘ज्यादा खरीदें, सस्ता खरीदें’ था! वो इसलिए क्योंकि ओमिक्रॉन बढ़ रहा है, इस साल एक जनवरी की तुलना में यात्री 37% कम हो गए हैं, स्कूल व ज्यादातर दफ्तर ऑनलाइन काम कर रहे हैं, दुकानों के खुले रहने का समय कम हो गया है, सर्दियों के आखिर तक विभिन्न राज्य सरकारों के प्रतिबंधों के साथ दुकानदार, खासतौर पर फैशन सामान बेचने वाले कम समय में ज्यादा पैसा बनाने के लिए भारी छूट दे रहे हैं।

इस वीकेंड अगर आप खरीदारी के मूड में हैं, तो ये जानकारी आपके लिए है। ये न सोचें कि ये जानकारी आपको खरीदारी कैसे न करें वाली सलाह देने के लिए है, बल्कि यह आपको बताने की कोशिश है कि कैसे गुणवत्तापूर्ण शॉपिंग कर सकते हैं। इस हफ्ते के शुरू में एक पाठक का पत्र आया, उसने पूछा, ‘क्या आप इस बारे में मार्गदर्शन दे सकते हैं कि कपड़े किस तरह नहीं खरीदें?’ तब मैंने तय किया कि आसपास देखूं और लोगों से बात करके कुछ ज्ञान जुटाऊं।

कई लोगों ने माना कि वे खुशकिस्मत हैं कि उनके पास बहुत अच्छी के साथ कम अच्छी चीजें भी हैं, जो उन्होंने सस्ते दामों पर आंखों को अच्छी लगने के कारण खरीदीं, जिनसे मूड भी अच्छा हुआ था। पर बाद में जब वे जल्दबाजी में कपड़े पहनने के लिए बड़ा दराज़ खोलते हैं, तो हमेशा अच्छी चीज़ें चुनते हैं। तब मैंने पूछा कि ऐसा क्यों होता है, उन्होंने बताया कि ज्यादातर लोग पहनने के लिए सस्ता खरीदते हैं पर एक बार पहनने के बाद अच्छा महसूस कराने वाला नयापन खो जाता है।

परिणाम ये होता है कि धीरे-धीरे वार्डरोब उन चीजों से भर जाता है, जिन्हें कम पहना या एक बार ही पहना, वो भी तब, जब खरीदा। फैशन विशेषज्ञ कहते हैं, ‘खरीदारी करते समय एक बदलाव करें’ और वो ये कि ‘कपड़ों को इस निगाह से कभी न देखें कि वह कैसा लग रहा है, बल्कि कल्पना करें कि आप उसमें कैसे लगेंगे।’ जाहिर तौर पर इससे फैशन की लत दूर करने में मदद मिलेगी, अगर कोई है तो, वो भी रातों रात। मैंने हमेशा उन छोटे ब्रांड्स को तवज्जो दी, जो इलाके में लोकप्रिय हैं और वो क्या बनाते हैं, उसके प्रति जुनूनी हैं।

वो ऐसे ब्रांड्स हैं जिनके पास विज्ञापन के लिए कम पैसा है, ज्यादा प्रचार मुंहजुबानी होता है। अगर वे अपने काम में अच्छे नहीं होंगे, तो सर्वाइव नहीं कर पाएंगे। कई बार लोग मुझे कहते हैं, ‘हे, तुमने ये कहां से लिया?’ उन कपड़ों पर खर्च करना चाहिए जो असल में हम पहनते हैं। मेरी सलाह है कि खुद के लिए खरीदें और ना कि किसी विशेष अवसर पर पहनने के आइडिया पर। अच्छे कपड़े सिर्फ विशेष अवसरों के लिए नहीं होना चाहिए बल्कि ये रोजमर्रा के जीवन में होने चाहिए।

हममें से किसी को भी बमुश्किल दो या तीन से ज्यादा सुपर-स्मार्ट आइटम की जरूरत नहीं होती जिस पर लोग कहें कि ‘क्या तो किलर ड्रेस है।’ शॉपिंग के दीवाने कई स्टाइलिस्ट हैं जिनके पास कुछ भी है, पर कुछ ऐसे भी हैं जो अपनी पसंद पर गर्व करते हैं, उदाहरण के लिए उनकी मौजूदा में से बेस्ट ब्लैक ब्लेजर।

इसीलिए वे पार्टी में हमेशा अलग नजर आते हैं। महिलाओं के पास मौजूदा कपड़ों, गहनों, बैग, जूतों के मेल से खुद को संवारने के ज्यादा मौके हैं। इसलिए वे बिना कुछ नया खरीदे भी डोपामाइन (खुशी का रसायन) का लुत्फ ले लेती हैं। इससे वार्डरोब को ज्यादा बेहतर व रचनात्मक बनाने में मदद मिलती है। धीरे-धीरे कुछ दिनों में आपका वार्डरोब ज्यादा अच्छे कपड़ों से निखरता जाएगा।

फंडा यह है कि कम व बेहतर खरीदने की वकालत करना घिसा-पिटा लग सकता है, लेकिन यह अंततः हमारे कपड़े पहनने का तरीका पूरी तरह बदल देता है, आगे चलकर खरीदारी का तरीका भी।