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एन. रघुरामन का कॉलम:नए रिश्तों के लिए पुराने संबंध ना तोड़ें क्योंकि सुनामी में दोनों रिश्ते बिखर जाते हैं

21 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

2013 में जब हमने तीन महीने के चीकू और चीनी (पेट् डॉग) को अडॉप्ट किया तो वे असल में अपने चार भाई-बहन, माता-पिता से अलग हो गए थे। जब हम उन्हें लेकर बाहर जाने लगे तो उसकी मां देर तक भौंकती रही थी- मतलब वह बच्चों को गोद लिए जाने का विरोध कर रही थी। पर उसी रात जब हम उन्हें वापस ले गए तो उसने हमारा स्वागत किया और हमारी ओर दुम हिलाने लगी (थैंक्यू कहने का तरीका) और तुरंत बच्चों को चाटने लगी- यह पशुओं का दुलारने का तरीका है।

अगले 15 दिनों तक हम रोज उन्हें सुबह मायके (जहां जन्म हुआ) से लेते और ससुराल (हमारे घर) ले आते, फिर रात को वापस भाई-बहनों के साथ खेलने के लिए मायके छोड़ आते। दिन बीतने के साथ ससुराल में बीतने वाला वक्त बढ़ता गया। नौवें दिन उन्होंने रात में मायके में रुकने से मना कर दिया और मां ये देखने तक नहीं आई कि बच्चे कहां जा रहे हैं। फिर उन्होंने दिन में मायके जाना शुरू कर दिया और बाकियों के साथ दो घंटे खेलकर वापस हमारे यहां आ जाते।

15 दिन बाद से वे फिर हफ्ते में एक बार जाते, ये क्रम महीने भर चला और उसके बाद हर तीन महीने में एक बार जाते। आज 9 सालों बाद भी जब हम वहां से गुजरते हैं तो चंद मिनटों के लिए उन्हें उनके मायके छोड़ देते हैं। पुराने रिश्ते (पैरेंट्स के घर) को तोड़े बिना नए रिश्तों (हमारे साथ) में उन्हें आता देख मुझे बहुत अच्छा लगा। यहां तक कि उनके छह भाई-बहनों में चीकू-चीनी सिर्फ पैरेंट्स के पास रेगुलर जाते हैं!

पैरेंट्स हमेशा पैरेंट्स ही रहते हैं। आज अगर मैं इस खूबसूरत दुनिया में अपना अस्तित्व रखता हूं और बीते छह दशकों से मानव विकास का साक्षी हूं तो यह सिर्फ मेरे माता-पिता के कारण है, जिन्होंने मुझे पैदा किया, मुझे शारीरिक रूप से फिट बनाने के लिए पोषणयुक्त भोजन कराया, ताकि मैं बिना किसी बड़ी बीमारी के काम कर सकूं, मुझे स्कूल-कॉलेज भेजकर ज्ञान से परिपूर्ण किया, ताकि मैं हुनरमंद होकर इस व्यापारिक दुनिया में अच्छा काम कर सकूं, मुझे इमोशनल-सोशल स्किल सिखाए, ताकि मैं बाकी लोगों के साथ विनम्र रहूं और अपनी खुद की सोसायटी बना सकूं जहां मुझे सम्मान मिले, मुझे नैतिक कहािनयां सुनाईं ताकि मैं अच्छे और बुरे के बीच में फर्क कर सकूं, यह न सिर्फ मेरे और मेरे परिवार के लिए हो बल्कि पूरे समाज के लिए हो।

ये निजी अनुभव मुझे इसलिए याद आया क्योंकि इस हफ्ते मुझे ढेरों ईमेल मिले, जिसमें लोगों ने पूछा कि आफताब पूनावाला द्वारा अपनी पार्टनर श्रद्धा वाल्कर की जघन्य हत्या पर मैं चुप क्यों हूं। श्रद्धा के लिए मुझे बहुत बुरा लग रहा है, पर मैं ये भी सोच रहा हूंं कि क्या वजह रही जो उसने पैरेंट्स से कहा, ‘मैं 25 साल की हो गई हूं और अपने निर्णय लेने का मुझे पूरा कानूनी हक है और अब मैं आपकी बेटी नहीं रही।’

माता-पिता और बच्चों के संबंध में ‘मैं अब आपकी...’ जैसा कुछ नहीं होता, हमारे शरीर के हर डीएनए में, हमारे हर चरित्र में और हमारी बचपन की हर आदत में ना सिर्फ हमारे माता-पिता बल्कि दादा-दादी और कई पूर्वजों का अंश होता है।

मेरा व्यक्तिगत तौर पर मानना है कि बेचारी श्रद्धा आफताब द्वारा प्रताड़ित करने पर अपने माता-पिता से मदद नहीं मांग सकी, वो शायद इसलिए क्योंकि उसने अपने द्वारा कहे गए शब्द ‘मैं आपकी नहीं...’ को गंभीरता से ले लिया होगा। बेचारी बच्ची को अब कभी पता नहीं चल पाएगा कि पुराने रिश्ते (माता-पिता) हमारी जिंदगी की नींव होते हैं। और आगे चलकर हम दूर कहीं उड़ जाते हैं ताकि उस नींव पर अपना सपनों का घर(नए रिश्ते) खड़ा कर सकें।

फंडा यह है कि नए रिश्तों के लिए पुराने संबंध ना तोड़ें क्योंकि सुनामी (पढ़ें नए रिश्ते में तकरार) में दोनों रिश्ते बिखर जाते हैं।