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एन. रघुरामन का कॉलम:समस्याओं को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर लोगों को ताकतवर बनाएं

17 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

‘आज जब हर बीवरेज कम्पनी किसी जलस्रोत के समीप फैक्टरी लगाने की कोशिश कर रही है, तब एक ऐसा व्यक्ति भी है, जो इससे अलग सोच रखता है। यह उसी की कल्पना थी कि क्यों न बीवरेज के लिए इस देश के हर घर से पेजयल का इस्तेमाल किया जाए।’ सराहना के ये शब्द मेरे पिता ने छह दशक पूर्व एक पेशेवर फ्लैवरिस्ट के लिए कहे थे, जिन्होंने लीक से हटकर सोचा और 1970 के दशक के उत्तरार्ध के बाद से हर निम्न-मध्यमवर्गीय भारतीय की प्यास बुझा रहे हैं।

वास्तव में उनकी बीवरेज यूनिट ने न केवल स्थानीय भारतीय ब्रांड्स गोल्ड स्पॉट और मैंगोला को कड़ी प्रतिस्पर्धा दी थी, बल्कि कोक और पेप्सी जैसे अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स का भी बड़ी बहादुरी से सामना किया था। उन्होंने जलस्रोतों के निकट बॉटलिंग प्लांट स्थापित करने, उन बोतलों को ट्रांसपोर्ट करने और उन्हें कलेक्ट व रीफिल करने की चिंता नहीं की।

अगर आपने अभी तक उनके नाम का अनुमान नहीं लगाया है तो मैं आपको एक लोकप्रिय टैगलाइन बताता हूं। आपको वह लड़की याद है, जो उन दिनों कहा करती थी- ‘आई लव यू, रसना?’ वह न केवल क्यूट थी, बल्कि उसने गुजरे जमाने की अनेक मांओं की स्वयं की ड्रिंक बनाने और बच्चों को खुशियां देने में भी मदद की थी।

रसना का पैक पांच रुपए का आता था, जिससे 32 गिलास कोल्ड ड्रिंक बनाई जा सकती थी। आज उसकी कीमत 140 रुपए है, इसके बावजूद लाखों के द्वारा उसका सेवन किया जाता है। अहमदाबाद स्थित इस फर्म के पास आज स्प्रेड्स का एक विविधतापूर्ण पोर्टफोलियो है।

मुझे दो कारणों से अपने बचपन के दिनों में क्रिकेट खेलने के बाद यह ड्रिंक पीने की याद आई। इस ड्रिंक के फाउंडर अरीज पिरोजशॉ खम्बत्ता का विगत 19 नवम्बर को 85 वर्ष की आयु में देहांत हुआ है। दूसरा दिलचस्प कारण यह है कि केरल के फुटबॉलप्रेमियों ने मौजूदा फीफा विश्व कप को शांति से बिग स्क्रीन पर देखने के लिए एक घर खरीदा, उसकी मरम्मत करवाई, फिर उसमें बड़ा-सा टीवी लगाया और सोमवार शाम को इंग्लैंड-ईरान मैच आराम से बैठकर देखा।

इससे पहले एर्नाकुलम के ये 17 दोस्त अनेक वर्षों से बड़ी स्क्रीन लगाकर मैच देखते आ रहे थे और इसके लिए वे जनरेटर को भी किराए पर लेते थे, ताकि किसी शेड या खुली जगह में अपनी गेदरिंग्स को आयोजित कर सकें। लेकिन कालांतर में ये खुली जगहें बिक गईं और इन पर इमारतें तान दी गईं। ऐसे में 2022 का विश्व कप देखना मुश्किल हो गया था। तब इन दाेस्तों ने 1300 स्क्वेयर फीट का एक घर ढूंढा, जिसकी कीमत 23 लाख रु. थी।

सबने डेढ़ लाख दिए और उससे घर खरीदकर उसका रिनोवेशन कराया। दीवारों को उन्होंने ब्राजील, अर्जेंटीना, पुर्तगाल के रंगों से रंग दिया और नेमार, मेस्सी, रोनाल्डो जैसे सितारों के पोर्ट्रेट्स बनाए। उन्होंने वहां एक बिग-स्क्रीन टीवी और स्पीकर्स लगाए। यह जगह हर उस व्यक्ति के लिए खुली है, जो बिना किसी व्यवधान के मैच देखना चाहता है।

घर को सभी 17 दोस्तों के नाम से पंजीकृत किया गया है। वे इसे फुटबॉलप्रेमियों के लिए स्थायी जगह बनाना चाहते हैं, जैसे हर शहर में किताबप्रेमियों के लिए लाइब्रेरी होती हैं। चूंकि पूरा गांव ही फुटबॉलप्रेमी है, इसलिए यह जगह भी फुटबॉल-लाइब्रेरी का ही काम देगी। शायद आने वाले दिनों में दूसरे खेलों के लिए भी ऐसे ही उपाय आजमाए जाएं और इसका शुल्क भी लिया जाए।

फंडा यह है कि आपको किसी भी समस्या को सुलझाने का पूरा लोड अपने दिमाग पर लेने की जरूरत नहीं है। समस्याओं को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर और सबको ताकतवर बनाकर भी आप उन्हें सुलझा सकते हैं।