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एन. रघुरामन का कॉलम:बच्चों को अभियान शुरू करने में मदद करें, उनके द्वारा शुरू किए गए अभियानों में हमेशा होती है शुद्धता

8 महीने पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

अभी जहां देखें, वहां पढ़ाई पर ध्यान और चिंता दिखेगी। इस रविवार प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मन की बात’ में बरेली के एक स्कूल की प्रिंसिपल की सराहना की, जिन्होंने दिव्यांग बच्चों के लिए शिक्षा सुनिश्चित करने की पहल की है। दीपमाला पाण्डेय (38) ने एक अभियान चलाया, जिसके तहत पिछले साल महामारी के बाद से उप्र के विभिन्न जिलों के 600 दिव्यांग छात्रों का स्कूलों में दाखिला हुआ है।

प्रधानमंत्री ने कहा, ‘बरेली में यह अनोखा प्रयास न सिर्फ दिव्यांग बच्चों को नया रास्ता दिखा रहा है, बल्कि 350 से ज्यादा शिक्षक भी इसमें सेवाभाव से जुड़ गए हैं।’ विश्व स्वास्थ्य संगठन की मुख्य वैज्ञानिक डॉ सौम्या स्वामीनाथन इस हफ्ते चेन्नई में थीं। उन्होंने एक सर्वे का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछले 19 महीनों में लर्निंग का बहुत नुकसान हुआ है और सरकार को सभी कक्षाओं के लिए स्कूल फिर खोलने पर विचार करना चाहिए।

तमिलनाडु के त्रिची में स्कूल शिक्षा विभाग के सेवानिवृत्त और सेवारत अधिकारियों ने अमेरिका के समान सोच वाले तमिल लोगों के साथ मिलकर सरकारी स्कूलों के ग्रामीण छात्रों और शिक्षकों के लिए मुफ्त कम्प्यूटर ट्रेनिंग (वर्चुअल) प्रोग्राम शुरू किया है, ताकि उन्हें कम्प्यूटर विज्ञान में महारत मिले और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उनकी मौजूदगी बढ़े। सिर्फ बड़े, पढ़े-लिखे लोग ही यह जरूरत नहीं समझ रहे।

दूसरी कक्षा का छात्र भी जानता है कि शिक्षा सच्ची दौलत है। प्रणित धारेवा का उदाहरण देखें जिसने बातों-बातों में अपने माता-पिता, कमल तथा पूजा से शिक्षा का महत्व जाना कि कैसे बच्चों को महामारी के दौरान उचित स्कूली शिक्षा नहीं मिल पा रही क्योंकि स्कूल बंद हैं। माता-पिता, दोनों बारी-बारी उसके साथ बैठे और बताया कि गरीब बच्चे स्मार्टफोन नहीं खरीद सकते इसलिए ऑनलाइन कक्षा में शामिल नहीं हो पा रहे।

मुंबई के मीरा रोड स्थित सेवन स्क्वेयर एकेडमी स्कूल में दूसरी के छात्र प्रणित ने दूसरों को पढ़ाने में रुचि दिखाई। माता-पिता ने उसके विचार का समर्थन किया और सोचा कि उसकी इच्छा पूरी कर नतीजे कैसे पाएं। पहले उन्होंने उन छात्रों की मदद करने कहा जो कभी स्कूल नहीं गए। चूंकि माता-पिता पेशे से सीए हैं, उन्होंने कुछ परिचित एनजीओ से संपर्क किया, जिन्होंने झोपड़-पट्‌टी वाले इलाकों में ऐसे बच्चों के बारे में पता किया जो कभी स्कूल नहीं गए, लेकिन पढ़ाई में रुचि रखते हैं।

किस्मत से प्रणित को एक छात्र मिला जो उससे उम्र में बड़ा था और उसने ऑनलाइन क्लास शुरू की। जैसे-जैसे बात फैली, इस सबसे छोटे शिक्षक को और छात्र मिलने लगे। आज प्रणित 30 छात्रों को रोजाना एक घंटे पढ़ाता है। वह हर रात मां के साथ बैठकर अगले दिन की क्लास के लिए पीपीटी बनाता है। सभी बच्चे उसे ‘भैया’ कहते हैं। वह बड़े भाई की तरह बर्ताव करता है और क्लास के दौरान पढ़ाई के अलावा कोई बात नहीं करता।

पूजा मानती हैं कि उनके बेटे ने एक अभियान छेड़ दिया है, जैसा उप्र में दीपमाला ने किया। वे कहती हैं, ‘कल्पना करें अगर हर अच्छा छात्र एक ऐसे छात्र को पढ़ाने लगे जो औपचारिक स्कूलिंग का खर्च नहीं उठा सकता।’ बेशक ये छोटे-छोटे कदम समाज में बड़ा बदलाव लाकर साक्षरता दर बढ़ाएंगे। इससे सुविधासंपन्न बच्चों में अभावग्रस्त बच्चों के प्रति समानुभूति जागेगी।

इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि प्रणित जैसे बच्चे दूसरों के प्रति संवेदनशील बनेंगे, चाहे उनकी सामाजिक हैसियत जो भी हो। फंडा यह है कि बच्चों द्वारा शुरू किए गए अभियानों में हमेशा शुद्धता होती है और इनका निश्चिततौर पर पूरे देश पर सकारात्मक असर होगा।

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