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एन. रघुरामन का कॉलम:अगर कोई कहता है, ‘मैं बोर हो रहा हूं’ तो उनको बताएं कि उन्हें अपने बारे में कुछ सोचने का समय मिला है

17 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

मुम्बई से फ्लाइट के दौरान विंडो सीट पर बैठने के तीन मिनट बाद ही एक व्यक्ति ने मेरे समीप वाली सीट पर अपना हैंडबैग फेंक दिया। वे रैक पर दूसरा बड़ा बैग रखने के लिए भी जगह खोज रहे थे। जब जगह नहीं मिली तो घंटी बजाकर एयरहोस्टेस को बुलाया और झल्लाते हुए कहा कि यहां बैग रखने की भी जगह नहीं है। एयरहोस्टेस ने शांति से सूटकेस लिया और उसे बिजनेस क्लास में रख दिया।

इसके बाद उन्होंने लैपटॉप बैग उतारा और मेरे पास वाली सीट में धंस गए। इससे ऐसी ध्वनि निकली, जैसे किसी स्टेशन पर भाप का इंजिन आकर रुका हो। इस आवाज ने मुझ सहित अन्य पैसेंजर्स को असहज बनाया और इससे यह साफ पता चल गया कि वे एक बदतमीज यात्री थे। सीट पर बैठने के बाद उन्होंने खुद से कहा, ‘मैं रोज-रोज प्लेन में यात्राएं करते हुए बोर हो गया हूं।’

यकीन मानिए, नियमित यात्राएं करने वाला कोई व्यक्ति वे सब चीजें नहीं करता है, जो उन्होंने की थीं। उनकी परेशानी देखते हुए मैंने कहा, ‘बचपन से अभी तक हमें यह सिखाया जाता रहा है कि हम जीवन से ऊब को बाहर निकाल दें। लेकिन रिसर्च बताती हैं कि ऊब हमारी सेहत के लिए जरूरी है।’ अब वे इस विषय में दिलचस्पी लेने लगे और मुझसे बातें करने लगे। मेरा आइडिया सिम्पल था।

मैं नहीं चाहता था कि उनकी हरकतों से मेरी यात्रा बरबाद हो जाए, इसलिए मैं उन्हें किसी स्वस्थ बातचीत में उलझाए रखना चाहता था। अपनी किताब ‘बोर्ड एंड ब्रिलियंट’ में मनाउश जोमोर्दी कहती हैं, ‘जब हमारा दिमाग इधर-उधर भटकने लगता है तो हम ‘डिफॉल्ट मोड’ को एक्टिवेट कर देते हैं।

यही वह मानसिक जगह है, जहां हम अपनी समस्याएं सुलझाते हैं, अपने सबसे अच्छे विचारों को प्रस्तुत करते हैं और ‘ऑटोबायोग्राफिकल प्लानिंग’ में व्यस्त होते हैं।’ वे कहती हैं इसी तरह हम दुनिया और अपने लक्ष्यों के बारे में समझ विकसित करते हैं। सेंट्रल लैंकशायर यूनिवर्सिटी की क्लासिक प्रोफेसर डॉ. सैंडी मान के द्वारा हाल ही में किया गया एक प्रयोग यह चौंकाने वाला परिणाम बताता है कि ऊब का कालखंड हमारी लैटरल थिंकिंग को प्रेरित कर सकता है।

उनके प्रयोग में सम्मिलित होने वाले समूह का जीवन बाधाओं से भरा था और इससे उन्होंने अपनी काल्पनिक दुनियाएं रच डाली थीं। कैल्गेरी यूनिवर्सिटी के क्लासिक प्रोफेसर पीटर टूहे अपनी किताब ‘बोर्डम अ लाइवली हिस्ट्री’ में कहते हैं, ‘ऊब दो तरह की होती है- परिस्थितियों से निर्मित होने वाली और अतिरेक से उत्पन्न होने वाली।

पहली वाली ऊब लम्बी और नीरस बैठकें या लम्बी कार ड्राइव जैसी स्थितियों से निर्मित होती है। जबकि दूसरी वाली ऊब जरूरत से ज्यादा खाने, ड्रिंक या चीजों के दोहराव से पैदा होती है।’ पीटर कहते हैं, ‘ऊब हमें नुकसान पहुंचाने वाली सामाजिक स्थितियों से दूर करके हमारा बचाव करती है।’

एवा हैफमान ने अपनी किताब ‘हाऊ टु बी बोर्ड’ में बताया है कि कैसे डिजिटल और प्रतिस्पर्धी संसार में बिजनेस-कल्चर विकसित होती है और हमें अपने बारे में सोचने का समय नहीं देती। ऊब से हम वह समय निकाल पाते हैं। एवा कहती हैं कि ‘जब हमारा दिमाग भटकता है और हममें खीझ पैदा करता है तो वह हमें चिंतन, मनन, ध्यान जैसी महत्वपूर्ण चीजों की ओर ले जाता है।

इससे हम खुद को आध्यात्मिक रूप से सजग बना पाते हैं और हमारा जीवन अधिक समृद्ध और उदार हो जाता है।’ अन्य रिसर्च भी बताती हैं कि ऊब का सम्बंध प्रो-सोशल बिहेवियर और दूसरों को कुछ देने जैसे ताजगीभरे परिणामों से भी है।

फंडा यह है कि अगर कोई कहता है, ‘मैं बोर हो रहा हूं’ तो उन्हें बताएं कि आपने अपने जीवन के वास्तविक अर्थ को जानने के रास्ते पा लिए हैं, क्योंकि इससे आपको अपने बारे में कुछ सोचने का समय मिला है।