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एन. रघुरामन का कॉलम:छोटे बदलाव करें जो हमारी उम्र से जुड़ी बायोलॉजी को 80% काबू कर सके

9 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

85 साल के दो लोग एक जैसे नहीं दिखते। एक बिना देखरेख के सुबह सैर पर जाता है, तो दूसरे को बाथरूम जाने के लिए भी नर्स चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि दूसरे व्यक्ति के लिए केक पर लगी मोमबत्ती से ज्यादा जैविक बदलाव असरकारक रहे। पर अच्छी खबर ये है कि उम्र बढ़ाने वाले अधिकांश कारकों को बेहतर करना या उनमें सुधार हमारे वश में है। अपने अंदर मौजूद उम्र रोकने वाली ताकत जानें।

रवैया मायने रखता है : ‘किसको बुड्‌ढा बोला, हां? बोल, किसको?’ ऐसे सवाल पूछने वाले अपनी उम्र से छोटा महसूस करते हैं, भले ही उन्हें कोई भी बीमारी-व्याधि क्यों ना हो। ये एटीट्‌यूड उम्र बढ़ने की गति धीमी कर देता है क्योंकि सकारात्मक रवैया कोशिकाओं के रसायन को लाभकारी में बदल देता है। ‘द नन स्टडी’ इसका सही चित्रण करती है।

अमेरिका में ‘स्कूल सिस्टर्स ऑफ नोट्रे डेम’ की 678 सिस्टर्स ने इस लंबे अध्ययन में हिस्सा लिया, जिसमें हेल्थ-मनोवैज्ञानिक टेस्ट नियमित हुए। पाया गया कि ज्यादा सकारात्मक रहने वाली नन औसतन एक दशक ज्यादा जीवित रहीं, डिमेंशिया की आशंका भी कम रही, जबकि सबसे कम खुश नन में से 60% की मृत्यु 80 साल तक हो गई थी।

अपना उद्देश्य खोजें : लोगों को कहते सुना होगा, ‘अब कोई जिम्मेदारी नहीं, बच्चे बस गए हैं, मैं ऐसे ही जीवन खींच लूंगा?’ जब हम रिटायर होते हैं, तो परिवार दूर हो जाता है, सामाजिक जीवन सिकुड़ जाता है। और अच्छे बुढ़ापे के लिए यहीं आपको एक उद्देश्य तलाशने की जरूरत है। उद्देश्य एक मनोवैज्ञानिक ताकत और संतुष्ट लंबे जीवन की कुंजी है। तंत्रिका संबंधी शोध से पता चला कि आर्ट बनाने या संगीत सीखने से न सिर्फ मूड बल्कि मस्तिष्क की सेल्स के बीच मजबूत-पक्के नए संबंध बनाने से संज्ञानात्मक प्रक्रियाएं भी बेहतर होती हैं।

महज आर्ट गैलरी जाने का भी सकारात्मक असर होता है। हमेशा नई चुनौतियां खोजें। प्रचुर मात्रा में मौजूदा डेटा से पता चलता है कि जो लोग सामाजिक कामों या धार्मिक गतिविधियों में स्वयंसेवा करते हैं वे कम उदास होते हैं। वे बेहतर स्मृति, योजना, आयोजन क्षमता, लंबा जीवन, गुणवत्तापूर्ण जीवन का आनंद लेते हैं। उन्हें आमतौर पर डिप्रेशन-चिंता कम होती है।

कसरत उम्र बढ़ने से रोकने का सबसे अच्छा तरीका है : 1950 में लंदन के दो पैथोलॉजिस्ट को पोस्टमार्टम के दौरान अचानक पता चला कि कंडक्टर्स की तुलना में बस चालकों की ज्यादा मौत हो रही थी, इसी तरह पोस्टमैन से ज्यादा डेस्क पर काम करने वाले पोस्टऑफिस कर्मी मर रहे थे। ये पहली बार था जब दुनिया को पता चला कि इस तरह बैठकर काम करने का जल्दी मौत से संबंध है।

इसलिए खुद को याद दिलाएं कि बस ऊपर-नीचे सीढ़ियां चढ़ने या टहलने से ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है, धमनियों में थक्के की आशंका कम होती है। ये हार्ट की मसल्स मजबूत रखता है। मजबूत दिल हृदय गति धीमी करता है, क्योंकि पूरे शरीर में खून पंप करने के लिए थोड़ी हार्ट बीट ही चाहिए। इससे अच्छा कोलेस्ट्रॉल भी बढ़ता है, जो धमनियों के मोटा होने का खतरा कम करता है। कसरत मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी अच्छी है।

प्रोटीन सप्लीमेंट्स खारिज न करें : हाल ही में 360 वयस्कों पर एक परीक्षण हुआ। उम्र से जुड़ी मांसपेशियों में क्षरण व कम ताकत की वजह से उन्हें 3 महीने ‘ल्यूसीन व्हे प्रोटीन’ व विटामिन डी दिया गया। असल में उनकी मांसपेशियों की ताकत बढ़ी। हमारे यहां कुछ लोग ये सिर्फ धूप में रहकर व सही खाना खाकर करते हैं।

फंडा यह है कि छोटे बदलाव करें जो हमारी उम्र से जुड़ी बायोलॉजी को 80% काबू कर सकते हैं, जिसे अपनी ‘एज-प्रूफिंग’ कहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे घर की छत में वॉटर प्रूफिंग करते हैं।

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