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एन. रघुरामन का कॉलम:करियर में कितना भी ऊंचा क्यों न उड़ें, अगर पैर जमीन पर हैं तो फिर ग्राहकों की नब्ज पकड़ने में मदद

19 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

कोई आदत डालने के लिए जिंदगी में हमें कोई न कोई प्रेरित जरूर करता है। पिछले वर्षों में मेरे अंदर एक ऐसी आदत विकसित हो गई है कि मैं दिन में कुछ समय निकालकर मेल पर आने वाले सारे पत्र पढ़कर उनका जवाब देता हूं, भले दो लाइन का हो। मैं प्रशंसा-आलोचना को बराबरी से लेता हूं और जितना हो सके खुद को निखारने की कोशिश करता हूं।

सारे पाठकों को उत्तर देने का एटीट्यूड अगर मैंने सीखा है और फीडबैक के आधार पर अपने काम में सुधार किया है तो इसका सारा श्रेय भारत की सबसे बड़ी रेिडयो शख्सियत अमीन सयानी को जाता है। आप सोच रहे होंगे कैसे? मैं बताता हूं।

अमीन सयानी का प्रसिद्ध कार्यक्रम बिनाका गीतमाला, जिसे 3 दिसंबर 2022 को 70 साल पूरे हो जाते, असल में उसके पीछे तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री बीवी केसकर थे, यह कार्यक्रम 1952 में शुरू हुआ था। रोचक बात ये थी कि फिल्मी गाने उस जमाने के युवाओं को रिझा रहे थे, उससे मंत्री नाखुश थे और ये कहते हुए ऑल इंडिया रेडियो स्टेशंस से गाने बैन कर दिए कि येे संस्कृति नष्ट कर रहे हैं।

उन दिनों दुनिया युद्ध से दूर थी और जिंदगी को जीते हुए गानों की लोकप्रियता बढ़ रही थी। फिर रेडिया विज्ञापन शुरू हुए। और सिबा गैगी कंपनी युवाओं में टूथपेस्ट-ब्रशिंग का कल्चर डालना चाह रही थी क्योंकि उस समय हम सब टूथ पाउडर व नीम की दातून करते थे। रेडियो सिलोन को गाने बैन किए जाने से कमर्शियल्स में अवसर दिखा।

भारत के हर घर तक पहुंचने के लिए उनके पास कई ताकतवर ट्रांसमीटर्स थे। ये सुविधा अंग्रेजों के कब्जे के दौरान पूरे एशिया-अफ्रीका पर नजर रखने के लिए की गई थी और 20वीं सदी के युद्धों में बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल हुआ। सिबा गैगी किसी ऐसे को ढूंढ रही थी जो स्क्रिप्ट लिखे, नैरेट करे और चुनिंदा गीत उद्घोष करे।

इसके लिए अमीन सयानी को 25 रु. प्रति प्रोग्राम में चुना गया। कार्यक्रम की सफलता का आकलन कार्यक्रम के बाद आने वाले पत्रों की संख्या से किया जाता। अमीन दुआ कर रहे थे कि कम से कम 100 पत्र आएंं। पर पहले कार्यक्रम के बाद 7 हजार पत्र मिले जो एक हफ्ते में 65 हजार हो गए। उनकेे लिए सबसे बड़ी चुनौती पत्र पढ़ना थी। हालांकि टीम मदद कर रही थी, पर अधिकांश पत्र वह खुद पढ़ते। अमीन सयानी की इस आदत से प्रेरित होकर मैंने सबको जवाब देने की आदत डाली।

बतौर ब्रांड दैनिक भास्कर ने भी यही आदत अपनाई है। 2003 में भास्कर ने पाठकों से पत्रों के जरिए कुछ सुझाव मांगे। पहले दिन पोस्टमैन पत्रों से भरी 11 बोरी लेकर आया। हफ्ते के आखिर में जयपुर ऑफिस में 2,10,000 से ज्यादा पत्र मिले, मैंने टीम में बाकी चार सदस्यों के साथ मिलकर रोज 20 घंटे लगातार छह हफ्ते वो पत्र पढ़े।

दिलचस्प बात है कि जब बतौर पत्रकार मैं बाद के वर्षों में अमीन सयानी से मिला तो ये जानकर मैं आश्चर्यचकित रह गया कि हमारी प्रेरणा एक ही व्यक्ति थे। हम दोनों केसी अमीन के प्रोग्राम को फॉलो करते थे, वह अमेरिकी डिस्क जॉकी, अभिनेता और रेिडयो शख्सियत थे, जिन्होंने रेडियो के कई कार्यक्रम तैयार करने के साथ होस्ट भी किए, इनमें ‘अमेरिकन टॉप 40’ सबसे खास है। कोई आश्चर्य नहीं कि अमीन सयानी के कार्यक्रम में सप्ताह के टॉप 16 गाने होते थे। केसी अमीन ने एक बार कहा था कि अपने पैर जमीन पर रखो और सितारों तक पहुंचने की कोशिश करते रहो।

फंडा यह है कि करियर में कितना भी ऊंचा क्यों न उड़ें, अगर पैर जमीन पर हैं तो फिर ग्राहकों की नब्ज पकड़ने से उनकी जरूरत के मुताबिक उत्पाद बनाने में मदद मिलेगी और इस तरह आपकी, प्रोडक्ट की और ब्रांड की उम्र लंबी होगी।