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एन. रघुरामन का कॉलम:जंगल में कोई शेर को राजा नहीं बनाता और न ही परिवार में कोई किसी को मुखिया बनाता है

16 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

‘नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने। विक्रमार्जित सिंहस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता!’ यानी जंगल में कोई शेर का राजतिलक नहीं करता है, वह अपने दमखम से खुद राजा बनता है। इस सुभाषित से हमें यह संदेश मिलता है कि हमें प्रोत्साहन के लिए किसी का इंतजार नहीं करना चाहिए, जीवन में अपनी क्षमताओं और चतुराई के सहारे ही आगे बढ़ना चाहिए।

यह मुझे विश्व कप में अर्जेंटीना बनाम सऊदी अरब का मैच देखते हुए याद हो आया। मेस्सी के जीत के जुलूस की उम्मीदों पर उस सऊदी अरब ने पलीता लगा दिया था, जो टूर्नामेंट की फेवरेट टीम नहीं थी। उसने फुटबॉल के इतिहास के सबसे नाटकीय उलटफेरों में से एक को अंजाम दिया।

मुझे वह सुभाषित इसलिए भी याद आया, क्योंकि मैं ‘लायन’ (पढ़ें लियो मेस्सी) के लिए बुरा महसूस कर रहा था। वे अपना पांचवां और सम्भवतया अंतिम विश्व कप खेल रहे हैं, लेकिन खेल के दौरान अनेक मर्तबा वे सिर झुकाए नजर आए! इससे मुझे उनके पूर्ववर्ती डिएगो माराडोना की याद आई, जिनके बचपन में उन्हें लगता था कि हर वो चीज जो गोल आकृति की है, वह गेंद है और उन्हीं के लिए बनी है।

वे जैसे ही कागजों का गोला, संतरा या कोई गेंद देखते थे, उनसे खेलने लगते थे। उनके पैर अपने आप गेंद को किक-अप करने लगते थे, या वे अपनी बैकहील से उसे उछालकर सिर पर ले आते थे और फिर अपने पैरों पर गिर जाने देते थे। यह सिलसिला चलता ही रहता था। शेर और मनुष्य में यही अंतर है कि इंसान पूरी टीम को प्रेरित करता है।

मैं निश्चित हूं कि मेस्सी के भीतर मौजूद ‘लायन’ भी जागेगा जरूर, ठीक वैसे ही जैसे एक मध्यमवर्गीय परिवार के योगेश वाझे ने अपने बेटे को बचाने के लिए शेर जैसा जज्बा दिखाया। मुम्बई निवासी वाझे ने पाया था कि उनका दो साल का बेटा निभीष PFIC-2 यानी प्रोग्रेसिव फैमिलियल इंट्राहेपैटिक कोलेस्टैसिस से जूझ रहा है। इस रोग में लिवर धीरे-धीरे बेकार होने लगता है।

यह एक दुर्लभ स्थिति है, जिससे एक लाख में एक नवजात बच्चा प्रभावित होता है। दुनिया में इस श्रेणी में दस लाख में से एक या दो ही बच्चों के लिवर ट्रांसप्लांट होते हैं। योगेश लिवर डोनेशन के लिए उपयुक्त थे, लेकिन उनका वजन अधिक था। उन्होंने एक फिटनेस ट्रेनर रखा और वजन घटाने का प्लान बनाया। वे हरी सब्जियों के साथ प्रोटीन डाइट लेने लगे, जिसमें कार्बोहाइड्रेट न हो।

खानपान में अनुशासन, व्यायाम और ऑफिस के कामकाज के चलते उन्होंने सिर्फ दो महीने में 10 किलो वजन घटा लिया। अक्टूबर में उन्होंने डोनर के रूप में सर्जरी कराई। उनकी सर्जरी सात घंटे और बेटे की आठ घंटे चली। आईसीयू में 28 दिन रहने के बाद निभीष अब स्वस्थ हैं। यकीनन, उनके बेटे के लिए पिता एक शेर ही साबित हुए!

जब मैं निभीष की कहानी पढ़ रहा था, तो मेरे दिल में उन बच्चों के लिए भावनाएं उमड़ने लगीं, जिनके पिता की कोविड महामारी के दौरान मृत्यु हो गई है और अब वे अपनी आजीविका कमाते हैं यानी वे अपने परिवार के लिए शेर की भूमिका निभाते हैं।

मार्च 2020 में कोविड की शुरुआत के बाद से अकेले महाराष्ट्र में ही 28,802 बच्चों ने अपने पैरेंट्स को गंवाया है। इनमें 2919 मां और 25,883 पिता थे। क्या पता इन परिवारों में भी मां शेरनी की भूमिका में आकर बच्चों की सुरक्षा कर रही हों! उन सभी को मेरा सलाम।

फंडा यह है कि जंगल में कोई शेर को राजा नहीं बनाता और न ही परिवार में कोई किसी को मुखिया बनाता है। वे खुद ही चीजों की जिम्मेदारी लेते हैं। और वे कभी नहीं कहते कि वे राजा या रानी हैं, क्योंकि वे शेर होते हैं!