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एन. रघुरामन का कॉलम:असली घटनाएं हमें सामाजिक जिम्मेदारियों का कराती हैं एहसास

22 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

10 नवंबर को भारतीय मूल के मलेशियाई नागेंथ्रन के धर्मलिंगम को 2009 में सिंगापुर में हेरोइन ले जाने के मामले में फांसी दी जाएगी। सिंगापुर के नशीली दवा दुरुपयोग अधिनियम के तहत नवंबर 2010 में ही मौत की सजा सुना दी गई थी। तभी से बहस जारी है कि ‘क्या वह सही निर्णय था?’ बचाव पक्ष का तर्क था कि वह मानसिक विकार से ग्रसित था और मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति को मौत की सजा अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन होगा।

उसके मलेशियन परिवार ने सिंगापुर के गृह मंत्रालय द्वारा हालिया जारी बयान की निंदा की जिसमें कहा गया कि जब अपराध हुआ उस समय आरोपी ‘मानसिक रूप से उतना कमजोर नहीं था।’ इसने मुझे अकादमिक कारणों से जिज्ञासु और ये जानने का इच्छुक बना दिया कि कितनी मानसिक अस्थिरता किसी को ‘पागल’ घोषित करती है, जैसा लोग कहते हैं। यहां तक कि अमेरिका में भी सीमित बौद्धिक क्षमताओं वाले लोगों को मौत की सजा से रोकने के लिए कानून हैं।

दूसरों का नहीं पता, पर 8 नवंबर को इस मामले पर मेरी नजर रहेगी, जब उसके वकील आखिरी बचाव के तौर पर संवैधानिक चुनौती पेश करेंगे। संयोग से मैंने इस शनिवार को हाल ही में रिलीज फिल्म ‘जय भीम’ देखी, यह भी असल जीवन के मुद्दों पर आधारित है। फिल्म 1993 में तमिलनाडु के कुड्डलोर में घटी वास्तविक घटनाओं पर आधारित है। बांस की टोकरियां बनाने वाले आदिवासी राजाकन्नू पर, जहां वह काम करता था, उसी घर से गहने चुराने का आरोप लगता है।

शिकायत के आधार पर पुलिस उसे गिरफ्तार करती है, जिसकी पुलिस प्रताड़ना से हिरासत में ही मौत हो जाती है। अपना अपराध छुपाने के लिए पुलिस वाले रात में पड़ोसी जिले में उसकी बॉडी ठिकाने लगा देते हैं और दावा करते हैं कि वह हिरासत से भाग गया। राजाकन्नू की पत्नी पार्वती पति को खोजने की कोशिश करती है और मद्रास हाईकोर्ट के वकील के. चंद्रू तक पहुंचती है, जो न्याय की तलाश में उसका साथ देतेे हैं।

यह वकील जो बाद में मद्रास हाई कोर्ट के लोकप्रिय व सम्मानीय जज बने, उन्होंने उसी कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका लगाई। 13 साल की कानूनी लड़ाई के बाद कोर्ट ने फैसला सुनाया कि ये हिरासत में मौत का मामला था और आरोपी पुलिसवालों को राजाकन्नू की हत्या के लिए 14 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। स्थानीय मीडिया के साथ इंटरव्यू मेंं उन्होंने याद किया कि कैसे पुलिस ने उन्हें और पार्वती को केस के दौरान रिश्वत देने की कोशिश की।

पार्वती को न्याय दिलाने का मामला जस्टिस चंद्रू के ढेरों अविश्वसनीय योगदानों में से एक है, जो उन्होंने हाशिए पर खड़े वंचित लोगों के लिए दिए। मद्रास हाई कोर्ट में बतौर जज अपने साढ़े छह साल के कार्यकाल में उन्होंने 96 हजार केस निपटाए, मतलब एक दिन में 75 केस की उपलब्धि! यहां तक कि डॉ. बीआर आम्बेडकर भी मानते थे कि जब तक किसी को सामाजिक स्वतंत्रता नहीं मिलती, कानूनन मिली आजादी का औचित्य नहीं है, भले ही राजनैतिक रूप से हम समान होंगे।

चूंकि आज भी वंचित वर्ग के लोग न्याय के लिए संघर्षरत हैं, ऐसे में सूर्या अभिनीत यह फिल्म झकझोर देने वाली है और कई दशकों बाद आम्बेडकर के कहे शब्दों का महत्व बताती है। जस्टिस चंद्रू फाइव स्टार वकील बनने के बजाय वंचितों के लिए लड़े। जीवन मेंं क्या करना है, इसको लेकर पशोपेश में पड़े युवाओं के लिए वे सच्ची प्रेरणा हैं।

अगर आपके पास वक्त है, तो इस रविवार ये फिल्म देखें। बिना कोई उपदेश दिए ये सामाजिक होने की जिम्मेदारी को खूबसूरती से उठाती है। फंडा यह है कि असली घटनाएं हमें सामाजिक जिम्मेदारियों का एहसास कराती हैं और ये शायद करिअर का निर्णय लेने में मदद करें।