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एन. रघुरामन का कॉलम:बच्चों को जिंदगी के सबक की ट्यूशन उन्हें संपूर्ण इंसान बनाएगी, जो खुश रहने के लिए एक जरूरी गुण है

19 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

इसके लिए महामारी के कारण आए कक्षाओं के शिक्षण में व्यवधान को दोष दें या ऑनलाइन शिक्षा को अपनाने में अक्षमता को, पर बुधवार को जारी हुई एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट के मुताबिक अब 40% स्कूली बच्चे प्राइवेट ट्यूशन ले रहे हैं, जबकि 2018 में यह आंकड़ा 30% था। भारत में ज्यादातर विकासशील देशों की तरह अकादमिक सहायता और स्कूलों की अयोग्यता की पूर्ति के लिए शिक्षा की औपचारिक व्यवस्था के साथ-साथ ‘प्राइवेट ट्यूशन’ की व्यवस्था भी चलती है।

हाल के वर्षों में मांग और मार्केटिंग के बल पर प्राइवेट ट्‌यूटरिंग तेजी से उभरी है। इस संदर्भ में महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या ट्यूशन जाने से बच्चों बेहतर तरीके से सीखते हैं? ट्यूशन जाने वाले और न जाने वालों के सीखने के नतीजों में अंतर तलाशना और इसके पीछे प्राइवेट ट्यूशन को कारण बताना गुमराह कर सकता है। दोनों तरह के बच्चों में देखने योग्य और छिपे हुए अंतर हैं, जिससे ट्यूशन के असर को समझना जरा मुश्किल है।

मेरे बचपन में ट्यूशन शिक्षकों से तभी संपर्क किया जाता था, जब किसी विषय से जुड़े सवाल मेरे पिता की समझ से बाहर हो जाते थे। ऐसा रोज नहीं होता था। आज बच्चे हफ्ते में कम से कम 9 घंटे ट्यूशन पढ़ते हैं, जिससे 1.5 दिनों की अतिरिक्त स्कूलिंग हो जाती है। हम भी उन दिनों अपने चाचा, दादा-दादी, दोस्त के माता-पिता और कुछ पड़ोसियों के साथ अतिरिक्त पढ़ते थे।

उदाहरण के लिए जब अगस्त 1968 में मेरी बहन पैदा होने वाली थी, तब मेरी मां ने मुझे दो महीने की गर्मियों की छुट्‌टियों में मेरे मामा के घर ट्यूशन के लिए भेजा था, जो अभी 88 वर्ष के हैं। उन्हें परिवार का सबसे उदार व्यक्ति माना जाता था। उन्होंने उन 63 दिनों में मुझे ‘शेयरिंग’ (चीजें साझा करना) सिखाई। मेरी मां ने देखा था कि चूंकि मैं इतने साल से अकेला बच्चा था, मैं हर मामले में थोड़ा स्वार्थी हो गया था।

मैं किसी से खिलौने साझा नहीं करता था। अगर कोई घर आता था तो मैं सभी गेम छिपा देता था। मेरी मां को उन्हें निकालकर, मेहमान के बच्चों के साथ खेलने के लिए मनाने में बुहत मुश्किल होती थी। इसलिए मेरे माता-पिता ने मुझे ‘शेयरिंग’ की प्राइवेट ट्यूशन के लिए भेजा। उन दिनों में मैंने दो सबक सीखे। अपने शब्दों में कैसे उदार रहें और कैसे कुछ देने पर आपको और ज्यादा मिलता है।

वे कहते थे, ‘यह गणित जैसा नहीं है कि तुम गिनो कि कितना मिला। जिंदगी में कुछ चीजें गिनती और गणित के परे होती हैं, जो तुम्हारे भविष्य को आकार देंगी।’ वे बिल्कुल सही थे। मैंने अपनी छोटी बहन के साथ चीजें साझा कर वह खुशी पाई जिसे माप नहीं सकते। इससे हम दोनों के बीचे ऐसा रिश्ता पनपा, जो आज भी मजबूत है। किसी को कुछ देने की कला, जैसे किताबों से कहानियां पढ़ना, छोटों को वे किताबें देना, इनसे मैं उन दिनों सिर्फ मेरी बहन का नहीं, बल्कि उन कई बच्चों का ‘बड़ा भाई’ बन गया था, जो साल दर साल छुटि्टयों में घर आते थे।

आज भी उनके बच्चे मुंबई आते हैं तो यह मेरा काम है कि मैं उन्हें रात 10 से सुबह 5 बजे तक ‘मुंबई नाइट दर्शन’ के लिए ले जाऊं। फंडा यह है कि विषय के शिक्षकों के साथ ट्यूशन से बच्चे गणित और भाषाओं में अच्छे हो सकते हैं, लेकिन जिंदगी के सबक की ट्यूशन उन्हें संपूर्ण इंसान बनाएगी, जो खुश रहने के लिए एक जरूरी गुण है।