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एन. रघुरामन का कॉलम:जब किसी संस्था के मूल उद्देश्य से फोकस हट जाता है, तो फिर समाज में आप अपना सम्मान खो बैठते हैं

23 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

बचपन में हम सबने ना सिर्फ ‘लुका-छुपी’ खेली होगी बल्कि इसमें जमकर मजे किए होंगे। इस खेल में सब छुपते थे और कोई एक ढूंढता था। याद करिए, ना जाने कितनी बार हम किसी के बगीचे, झाड़ियों और पेड़ के पीछे छुपे थे? आधुनिक दौर में इस खेल ने उल्टा अवतार ले लिया है, जहां बड़ी संख्या में प्लेयर्स आराम से घूमते हैं और एक शख्स अचानक पीछे से या छुपकर आता है और बाकी बेफिक्र लोगों को पकड़ लेता है।

खेल के इस वर्जन में पकड़े गए लोग 50 रु. से लेकर एक हजार तक देते हैं! इस खेल को सारी राज्य सरकारों से अनुमति मिली है और यह सुबह 8 के बाद से रात में करीब 10 तक ही खेलते हैं, जब शहर सोने चला जाता है। इस खेल में छुपा हुआ व्यक्ति आपको अपनी इच्छा से पकड़ने की शक्ति रखता है! आप ताज्जुब कर रहे होंगे कि ये क्या खेल है? अगर आपको अब तक समझ नहीं आया तो चलिए एक और संकेत देता हूं। पेड़ के पीछे छुपने वालों को पहनने के लिए आधिकारिक यूनिफॉर्म भी मिलती है!

अब मैं आपका धैर्य और नहीं परखना चाहता। हर शहर के ट्राफिक सिग्नल्स पर इस खेल में हम करीबन रोज ही पकड़े जाते हैं और पकड़ने वाले होते हैं यातायात पुलिस वाले। इसीलिए इसको मैं ‘छुपी-लुका’ कहता हूं। मैं हमेशा सोचता हूं कि ट्राफिक पुलिस की प्राथमिकता क्या हो? ट्राफिक सुलभ बनाना या छुपा-छुपी खेलकर चंद अपराधियों को पकड़ना?

हममें से ज्यादातर लोग मानने हैं कि पुलिस की मुख्य जिम्मेदारी ट्राफिक नियंत्रण है, जुर्माना वसूलना गौण होना चाहिए। चूंकि विभाग हर कांस्टेबल को वसूली टारगेट देता है, ऐसे में ट्राफिक नियंत्रित करने का उद्देश्य ओझल हो जाता है, पूरे देश में यही स्थिति है।

मुंबई में 1980-90 के दशक में सबसे लोकप्रिय ट्राफिक पुलिस वाले अमरजीत सिंह ने एक बार मुझे बताया था कि अगर पुलिस कॉन्सटेबल सिग्नल-चौराहों पर दिखाई दें तो नियम तोड़ने के 50% मामले वैसे ही कम हो जाएंगे। अब मैं सुझाव देना चाहता हूं कि आधुनिक ट्राफिक प्रबंधन में बाकी बचा 50% फाइन किसी एजेंसी से आउटसोर्स कराके वसूला जा सकता है।

जो कि पीछे खड़े रहकर सपोर्ट सिस्टम बनें, जहां पहले पुलिसवाले छुपे रहते थे। पर होता ये है कि हम देखते हैं प्रशिक्षु पुलिसवाले ट्राफिक संभालते हैं और असली पुलिसवाले नुक्कड़ पर नियम तोड़ने वालों से मोलभाव करते रहते हैं। जब तक यह उद्देश्य साफ नहीं हो जाता कि वे यातायात प्रबंधन के लिए हैं ना कि जुर्माना वसूलने के िलए, तब तक देश में ट्राफिक मैनेजमेंट का प्रोजेक्ट कभी सफल नहीं हो सकता।

इससे भी ऊपर ट्रैफिक डिपार्टमेंट हर महीने की फाइन वसूली की नियमित प्रेस रिलीज भी मीडिया में जारी करता है। मैं हमेशा सोचता हूं कि क्या ये गर्व की बात है कि उन्होंने इतना ज्यादा जुर्माना वसूला या शर्म की बात है कि वे ट्राफिक संभालने में नाकाम रहे जिसके चलते इतना जुर्माना जमा हुआ? मुझे पूरा यकीन है कि जमा की हुई जुर्माना राशि बताने में पुलिस को गर्व होता होगा। इस तरह से तो ट्रेफिक संभालना कभी उनकी प्राथमिकता में नहीं होगा।

हालांकि इससे इंकार नहीं कि हर शहर में ट्राफिक बढ़ रहा है। हाल ही मैंने रिपोर्ट पढ़ी कि मुंबई की सड़कों पर हर एक किमी में 1500 टू-व्हीलर्स होते हैं। उनमें कई दोपहिया चालक न सिर्फ सिग्नल तोड़ते हैं बल्कि फुटपाथ पर गाड़ी चढ़ा देते हैं वो भी गलत साइड से। इसलिए ट्राफिक संभालने वालों का उद्देश्य फाइन वसूलने के बजाय बेहतर यातायात प्रबंधन के तरीके खोजना हो, ताकि लोगों का यात्रा समय बचे।

फंडा यह है कि जब किसी संस्था के मूल उद्देश्य से फोकस हट जाता है, तो फिर समाज में आप अपना सम्मान खो बैठते हैं।