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एन. रघुरामन का कॉलम:आप कोई विशेष चीज बना सकते हैं तो उसका इस्तेमाल अपने बिजनेस को निरंतरता प्रदान करने

14 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

अगर आप हरिद्वार-रूड़की बेल्ट में हैं और आपको कढ़ी-चावल खाने की इच्छा होती है और आप किसी रिक्शा चालक से यह इच्छा जताते हैं तो वह आपको सीधे 10 बाय 10 वर्गफीट के एक मामूली-से रेस्तरां में ले जाएगा, जिसके साइन बोर्ड पर ही इस डिश का नाम लिखा है! जी हां, रेस्तरां का नाम है ‘कढ़ी चावल! (सहारनपुर वालों के प्रसिद्ध)।’ रूड़की नहर के समीप बीटी गंज रोड स्थित इस रेस्तरां की खासियत यह है कि खाना खत्म होने के बाद अपराह्न साढ़े तीन-चार बजे तक उसका मालिक शटर गिरा देता है।

जिन लोगों ने आधी रात तक रेस्तरां खुले देखे हैं, उन्हें यह अजीब लग सकता है। इस रेस्तरां को दो भाई चलाते हैं- मुकुल और उनके छोटे भाई पारस कश्यप। वे रोज सुबह 4 बजे जाग जाते हैं। मुंह-हाथ धोने के बाद वे उन बड़े-से बर्तनों का ढक्कन हटाते हैं, जिनमें रात को दही जमाया गया था। दही की गुणवत्ता से संतुष्ट हो जाने के बाद ही वे नित्यकर्म के लिए जाते हैं। यह दही 50 लीटर दूध से बनाया जाता है।

सुबह की चाय के बाद पूरा परिवार नहाता है और पूजा करता है। इसके बाद वे कढ़ी बनाने में जुट जाते हैं। दो क्विंटल कढ़ी बनाने में सामान्यतया तीन घंटे लगते हैं। सुबह 9 बजे तक सभी भाई कढ़ी को दुकान ले जाते हैं। इसके बाद मुकुल और पारस से बात करना भी दूभर हो जाता है, क्योंकि ग्राहकों की भीड़ उमड़ पड़ती है। रेस्तरां में बैठने के लिए कुर्सियां नहीं हैं, ग्राहक खड़े रहकर कढ़ी-चावल खाते हैं।

यह व्यवसाय उनके पिता ने 1990 में एक ठेले पर शुरू किया था। वे उस छोटे-से कस्बे में दिनभर एक से दूसरी जगह तक घूमते रहते थे। फिर उन्होंने एक जगह तय कर ली, जहां अच्छी बिक्री होती थी। आखिर वे उस जगह पहुंचे, जहां आज उनकी दुकान है और सड़क पर खड़े रहकर तब तक कढ़ी-चावल बेचते रहे, जब तक कि उनकी इतनी आमदनी नहीं होने लगी कि बीटी गंज रोड पर एक जगह किराए से ले सकें। 2008 में उन्होंने एक छोटी-सी दुकान किराए पर ले ली, फिर बाद में उसे खरीद लिया।

वहां बैठने की व्यवस्था नहीं थी, लेकिन खाना पैक और डिलीवर करने की सुविधा मिल जाती थी। खाने की गुणवत्ता से उन्हें लोकप्रियता मिली और बिजनेस बढ़ा। दोनों भाइयों ने पिता से घर पर पिसे मसालों की मदद से कढ़ी बनाने की कला सीखकर उसमें महारथ हासिल कर ली थी। 2019 में पिता की मृत्यु होने पर उन्होंने एक और दुकान किराए पर ली, ताकि और ग्राहकों को भोजन दे सकें, लेकिन वहां भी खड़े रहकर ही खाया जा सकता था।

उन्होंने छोले-भटूरे और आलू कचौरी बनाना भी शुरू किया, लेकिन ग्राहकों ने इसे स्वीकार नहीं किया। भाइयों को लगा इससे उनकी बेहतरीन कढ़ी बनाने की ब्रांड इमेज को धक्का लगेगा, इसलिए वे उसी पर फोकस करने लगे। बहुत सारे मिलेनियल्स की सीक्रेट-इच्छाओं में रेस्तरां खोलना शामिल होगा, लेकिन रेस्तरां खोलना हमेशा से एक जटिल विषय रहा है, क्योंकि यह चयन करना आसान नहीं होता कि हम ग्राहकों को क्या परोसेंगे।

लेकिन ये जटिलताएं कम हो सकती हैं और जोखिम भी घट सकता है, अगर हम कोई ऑफबीट फूड बिजनेस खोले, जैसे कि उन दोनों भाइयों ने किया। मजे की बात यह है कि रूड़की में एक और ऐसी खाने-पीने की दुकान है, जो दोपहर 2 बजे के बाद बंद हो जाती है! उस विशेष दुकान पर हम मुरादाबादी दाल खा सकते हैं।

फंडा यह है कि अगर आपके हाथ में जादू है और आप कोई विशेष चीज बना सकते हैं तो उसका इस्तेमाल अपने बिजनेस को निरंतरता प्रदान करने और उसे औरों से अलग बनाने में करें। सफलता आपके पीछे आएगी।