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एन. रघुरामन का कॉलम:जिन गरीब लोगों को पैसों की किल्लत होती है, उनसे आप बहुत सारे सबक सीख सकते हैं

2 महीने पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

शुक्रवार शाम मेरी नवविवाहिता भतीजी चेन्नई से मेरे यहां आई। वो वीजा के लिए शादी की कुछ तस्वीरें प्रिंट करवाना चाहती थी, ताकि विवाह प्रमाण-पत्र के लिए उनका इस्तेमाल किया जा सके। मैंने उसे एक स्टूडियो भेज दिया, जहां वो तस्वीरें प्रिंट करवा सकती थी। स्टूडियो घर से 200 मीटर दूर था। उसे 13 तस्वीरों की जरूरत थी, जिसकी कीमत उसने पूछी।

स्टूडियो संचालक ने कहा कि अगर एक घंटे में प्रिंट करवाना है तो हर तस्वीर के 50 रुपए लगेंगे, वहीं 24 घंटे में चाहिए तो 30 रुपए लगेंगे। उसने मुझे फोन लगाकर सलाह ली। चूंकि मैं जानता था कि तस्वीरें सोमवार सुबह ही कॉन्सुलेट में डिपॉजिट होंगी, इसलिए मैंने कहा कि 30 रुपए वाला विकल्प चुनकर घर आ जाए। लेकिन स्टूडियो संचालक स्मार्ट था और उसने उससे कहा कि वह सभी 13 कॉपीज़ एक घंटे से भी कम समय यानी 45 मिनट में दे सकता है, और वह भी 650 के बजाय मात्र 500 रुपयों में।

भतीजी ने सोचा कि इससे समय बचेगा इसलिए 500 रुपए चुकाकर घर आ गई और मुझे सारी बात बताई। मैंने उससे कहा कि जिस सर्विस की उसे तुरंत कोई आवश्यकता नहीं थी, उसके लिए भी उसने 110 रुपए ज्यादा चुका दिए और वह भी निगोशिएट किए बिना।

मैं उसके साथ स्टूडियो गया और संचालक से 25 रुपए प्रति कॉपी के लिए निगोशिएट किया, क्योंकि हम 13 तस्वीरें प्रिंट करवा रहे थे। मैंने उससे कहा कि वह डिलीवरी के लिए समय ले सकता है। दिलचस्प बात यह है कि उसने मात्र दो घंटों में ही तस्वीरें डिलीवर कर दीं।

तब मैंने अपनी भतीजी से कहा कि तुम एक ऐसे देश में जा रही हो, जहां हर डॉलर की कीमत अनेक रुपयों में है। अगर एक-एक रुपया (उसकी भाषा में एक-एक डॉलर) बचाने का रवैया विकसित नहीं किया तो तुम कर्ज के उसी जाल में फंस जाओगी, जिसमें आज कई अमेरिकी और यूरोपियन बच्चे फंस रहे हैं। वह पोस्ट-ग्रैजुएट है और अमेरिका में पीएचडी करने जा रही है।

उसने मुझसे कहा कि आपको कैसे पता, मेरी उम्र के जो स्टूडेंट्स निगोशिएट नहीं कर पाते हैं, वो कर्ज के जाल में फंस जाते हैं? मैंने उसे कुछ विदेशी चैनल्स दिखाए, जिनमें इस आशय के विज्ञापन आ रहे थे कि हम कर्ज के मामले में आपके बच्चों की मदद कर सकते हैं या आप लोन लेकर भी बचत कर सकते हैं... मैंने उसे बताया कि किसी भी चैनल पर इतनी संख्या में आने वाले बड़े विज्ञापन बताते हैं कि किसी समाज में इन दिनों क्या चल रहा है।

अमेरिका में जो लोग कम अमीर हैं, वो हमेशा येलो स्टिकर्ड आइटम्स यानी उन उत्पादों की तलाश करते हैं, जो जल्द ही ऑफ-सेल होने जा रहे हैं या बेस्ट-बिफोर डेट के निकट आ रहे हैं। सुपरमार्केट उन्हें कम दरों पर बेचते हैं, ताकि वे बर्बाद न हो जाएं। टेस्को जैसे कुछ सुपरमार्केट्स तो 90 प्रतिशत तक डिस्काउंट देते हैं।

वे मनी-सेविंग वॉट्सएप्प ग्रुप्स से भी जुड़े होते हैं, जो आइटम्स के नवीनतम डिस्काउंट के बारे में बताते हैं। उनके पास चिप, शॉपमियम, चेकआउटस्मार्ट सरीखे सेविंग एप्स हैं, जो अपने सदस्यों को बताते हैं कि बाय वन गेट वन फ्री के विकल्प कहां उपलब्ध हैं और कौन-सी कम्पनियां रसीदें अपलोड करने पर कैशबैक देती हैं। वित्तीय रूप से स्वतंत्र होने के लिए हमें अपनी आदतें बदल लेने के लिए तैयार रहना चाहिए।

फंडा यह है कि जिन गरीब लोगों को पैसों की किल्लत होती है, उनसे आप बहुत सारे सबक सीख सकते हैं और यकीनन सबसे बड़ा सबक यह है कि पैसों का किफायती रूप से कैसे इस्तेमाल करें। अगर आपका अपने पैसों पर नियंत्रण है तो पैसा आपको अपने काबू में नहीं रख सकेगा!