नंदितेश निलय का कॉलम:सिर्फ ट्रेनिंग या प्रशिक्षण से आप अपना व्यवहार या आदतों को नहीं बदल सकते

16 दिन पहले
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नंदितेश निलय, लेखक और वक्ता - Dainik Bhaskar
नंदितेश निलय, लेखक और वक्ता

कहा जाता है कि महान लोगों की बुनियादी आदतें एक समान होती हैं। जैसे वारेन बफेट हों या नारायण मूर्ति, उन्हें पढ़ना बहुत पसंद है। रोजर फेडरर हों या सचिन तेंदुलकर, इनके जीवन में खेल के प्रति निष्ठा और हर दिन अभ्यास उनके रूटीन का हिस्सा रहा है।

महात्मा गांधी प्रतिदिन के कार्यों का हिसाब डायरी में रखते थे और सोने के पहले पलटकर देखते थे कि दिन यूं ही तो नहीं बीत गया। तो क्या वो लोग कुछ खास होते हैं, जो अच्छी आदतों के साथ जीते हैं? और क्या हम अपनी आदतों से धीरे-धीरे बनते जाते हैं?

बिलकुल। हम अगर एक ही काम बार-बार करें तो वो हमारी आदत का हिस्सा हो जाता है। डॉ. स्टीफन आर. कोवी- जो दुनिया के अग्रणी प्रबंधन सलाहकारों में से एक हैं और सबसे अधिक बिकने वाली पुस्तक द सेवन हैबिट्स ऑफ हाईली इफेक्टिव पीपल के लेखक भी हैं- के अनुसार यह सच है कि हम सभी आदतों के ही प्राणी हैं।

न केवल हम कैसे कार्य करते हैं, लेकिन हम जो हैं, वह भी बहुत हद तक हमारी आदतों द्वारा ही तय होता है। हमारी अच्छी आदतों से लदी दिनचर्या हमारे चरित्र को परिभाषित करती है और हमारे व्यवहार को एक निश्चित दिशा में खींचती है। लेकिन प्रश्न यह है कि हम अच्छी आदतों को अपनाने में इतने उदासीन क्यों रहते हैं?

ऐसे युग में जहां सच और झूठ बहुवचन बन गए हैं और मनुष्य अपनी हर बुरी आदत को दम्भ के साथ सही ठहराने में लगा हुआ है, ऐसी स्थिति में कोई क्या करे? अपनी गलती नहीं मानना और अपने आप को सभी कमियों से परे समझना, लाइफस्टाइल डिजीज का शिकार होना, पद और पैसे के घमंड में चूर होना, फोन में चिपके रहना, अपने काम से मतलब रखना, जीवन को बैलेंस-शीट समझना, संबंधों को नेटवर्क का जामा पहनाना और खुद को कभी क्रेता और कभी विक्रेता समझना, ना पढ़ना न लिखना, व्यक्ति को साधन समझना और वस्तु से व्यक्ति की वैल्यू तय करना- ये सब आज अच्छी आदतों के लिए चुनौती ही तो हैं!

तो क्या आदतें बदल सकती हैं? और वो भी वयस्क होने पर? यह सवाल हर कोई पूछता है और व्यावहारिक प्रशिक्षण को सिर्फ इसी तथ्य से प्रभावशाली नहीं माना जाता क्योंकि लोग ट्रेनिंग या शिक्षण से व्यवहार नहीं बदलते। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ऑफ इंग्लिश आदत को एक व्यवस्थित या नियमित प्रवृत्ति या अभ्यास के रूप में परिभाषित करती है। वह जिसे छोड़ना मुश्किल है और वह जो एक स्वचालित प्रतिक्रिया है।

दार्शनिक जॉन लॉक ने आदत को कुछ भी करने की शक्ति या क्षमता के रूप में परिभाषित किया है, जब इसे एक ही काम को बार-बार करने से हासिल किया गया हो। नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ (एनआईएच) के अनुसार, कुछ आनंद-आधारित आदतों को तोड़ना कठिन है, क्योंकि सुखद व्यवहार आपके मस्तिष्क को डोपामाइन जारी करने के लिए प्रेरित करता है और डोपामाइन आदत को मजबूत करते हुए उसे फिर से करने की लालसा पैदा करता है।

यूरोपियन जर्नल ऑफ सोशल साइकोलॉजी में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, नई आदत बनाने में 18 से 250 दिन लगते हैं। वहीं नए व्यवहार को स्वचालित होने में 66 दिन लगते हैं। क्या गलत आदत को तोड़ना आसान है? दो चीजें लोगों को अपने व्यवहार में बदलाव लाने में मदद करती हैं- प्रोत्साहन और जवाबदेही। लेकिन अच्छी आदत को अपनाया कैसे जाए?

अमेरिकन सोसाइटी ऑफ ट्रेनिंग एंड डेवलपमेंट ने एक डेटा जारी किया है और इसके परिणाम बहुत दिलचस्प थे! उन्होंने पाया कि यदि आपको किसी के प्रति जवाबदेह ठहराया जाता है या आप किसी को वचन देते हैं कि आप एक लक्ष्य प्राप्त करेंगे तो सफलता की संभावना 95% तक बढ़ जाती है। आदत बनाने या बदलने में जवाबदेही सबसे महत्वपूर्ण है।

इसका मतलब यह भी है कि यदि आप अपने लक्ष्य को दोस्तों या परिवार से साझा करते हैं, तो गलत आदत छोड़ने की संभावना बढ़ जाती है। यह भी देखा गया है कि अगर भय या लालच से लोग आदत बदलते हैं तो वह स्थायी नहीं होता। लेकिन आदर, प्रेम, निष्ठा हमारी आदतों को स्थायी रूप से बदल देती हैं।

महात्मा गांधी ने सत्य के साथ प्रयोग करना ही आदत बना डाली थी। महामारी के दौरान इंसान ने भी आदतें बदलीं और जीवन मूल्यों की ओर बढ़ा। अच्छा होगा हम उन सारी गलत आदतों से खुद को दूर करें जो हमारे अंदर के इंसान के इंसान बने रहने की संभावना को कम करती हैं।

यदि आपको किसी के प्रति जवाबदेह ठहराया जाता है या आप वचन देते हैं कि लक्ष्य प्राप्त करेंगे तो सफलता की संभावना 95% तक बढ़ जाती है। आदत बनाने या बदलने में जवाबदेही महत्वपूर्ण है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)