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नंदितेश निलय का कॉलम:पुलिस बल ही नहीं, सेवा और साहस की भी प्रतीक है, स्त्रियों की हिस्सेदारी इसमें बढ़े

15 दिन पहले
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नंदितेश निलय, लेखक और वक्ता - Dainik Bhaskar
नंदितेश निलय, लेखक और वक्ता

किसी बच्चे से पूछें कि पुलिस अधिकारी कैसा होता है तो हो सकता है हम इनमें से कुछ या सभी के जवाब में यह सुन बैठें कि रौबदार मूंछें, गंभीर अभिव्यक्ति, तेज और मोटी आवाज, आक्रामक देहभाषा। लेकिन क्या यह सच है? लोकप्रिय मीडिया द्वारा प्रचलित इस रूढ़िवादी छवि पर आज कितने पुलिस अधिकारी फिट बैठते हैं? पुलिस में भी कितनी महिलाएं इस विवरण में फिट बैठेंगी? महिलाओं की पुलिसिंग से जुड़े अनेक प्रश्न हैं कि नौकरी चाहने वाली किसी युवा महिला के लिए आज पुलिस बल में कितनी सकारात्मकता है?

एक महिला पुलिस कांस्टेबल के लिए नौकरी से संतुष्टि का स्तर क्या है और उसके काम का माहौल कैसा है? नेतृत्व की स्थिति में एक महिला पुलिस अधिकारी के लिए पुरुष समकक्षों की तुलना में व्यावसायिक खेल का मैदान कितना समतल है? आदि। भारत जैसे पारंपरिक समाज में काम और परिवार के संतुलन पर महिलाओं का दृष्टिकोण पुरुषों से अलग होता है।

पुलिस में महिलाओं पर या तो अति-पुरुषत्व का आरोप लगाया जाता है या खुद को साबित करने के लिए अपने रूढ़िवादी पुरुष समकक्षों की तरह काम और व्यवहार करने का। लेकिन आज भी जिस तरह से महिलाओं का अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष रूप से शोषण होता है, ऐसी स्थिति में आवश्यक है कि वे ज्यादा से ज्यादा पुलिस यूनिफॉर्म में नजर आएं। लेकिन भारतीय पुलिस बल में महिलाओं का प्रतिनिधित्व निराशाजनक है। 2020 तक इसमें केवल 12% महिलाएं थीं।

कई राज्यों ने पुलिस में महिलाओं के लिए 10% से 33% आरक्षण अनिवार्य कर दिया है, लेकिन एक भी राज्य लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाया। उच्च रैंकों में महिलाओं की हिस्सेदारी 8.7% से भी कम थी। 2020 में बिहार की सिविल पुलिस में 25% महिलाएं थीं, जो देश में सबसे अधिक थीं। जम्मू-कश्मीर में केवल 3.3% महिलाएं थीं, जो सबसे कम है। अधिकांश राज्यों ने पुलिस बल में महिलाओं के लिए कुछ पद आरक्षित किए हैं। आरक्षण का हिस्सा 10% से 33% तक है।

हालांकि किसी भी राज्य ने लक्ष्य हासिल नहीं किया है। सभी राज्य सरकारों से अनुरोध तो किया गया है कि पुरुष कांस्टेबलों के रिक्त पदों को परिवर्तित करके महिला कांस्टेबल/सब-इंस्पेक्टर के अतिरिक्त पद सृजित किए जाएं, जिसका उद्देश्य यह है कि प्रत्येक पुलिस स्टेशन में कम से कम तीन महिला सब-इंस्पेक्टर और 10 महिला पुलिस कांस्टेबल हों ताकि एक महिला हेल्प डेस्क चौबीसों घंटे तैनात रहे।

यह आंकड़ा काफी कम है, क्योंकि केंद्र सरकार राज्यों को यह सुनिश्चित करने की सिफारिश कर रही है कि उनके पुलिसकर्मियों में कम से कम एक-तिहाई महिलाएं हों। महिलाओं और बच्चों से संबंधित संवेदनशील मामलों को संभालते समय बल में एक बड़ी महिला उपस्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। अमेरिका में 2020 में पूर्णकालिक नागरिक कानून प्रवर्तन कर्मचारियों में से 60 प्रतिशत महिलाएं थीं। लेकिन पूर्णकालिक कानून प्रवर्तन अधिकारियों में केवल 13.1 प्रतिशत महिलाएं थीं।

अमेरिका तक में कानून प्रवर्तन को निर्विवाद रूप से पुरुष-प्रधान पेशा माना जाता है, विशेष रूप से एफबीआई में। हालांकि शोध से पता चला है कि महिला अधिकारियों का समुदायों और कानून प्रवर्तन विभाग के समग्र प्रदर्शन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। क्या पुलिस थाने के स्तर पर महिलाओं के लिए बुनियादी सुरक्षा और सुविधाएं सुनिश्चित की गई हैं? क्या उन्हें पुलिस बल में अपने पुरुष साथियों के साथ काम करने में कोई भेदभाव तो नहीं महसूस होता? क्या जेंडर इंटेलीजेंस को बिना किसी पूर्वाग्रह के स्वीकार किया जा रहा है?

हमें समझना होगा कि प्रभावी पुलिसिंग शारीरिक, संज्ञानात्मक, भावनात्मक और पारस्परिक कौशल का संयोजन है। सभी को निरंतर इन विषयों पर प्रशिक्षण मिलना चाहिए। अधिक संख्या में अगर पुलिस बल को महिलाएं चुनती हैं तो यह तमाम लड़कियों के लिए साहस का प्रतीक बनेगा।

राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत हो तो महिलाओं को पुलिस में आने से कोई रोक नहीं सकता। पर यह सामाजिक संवेदनशीलता पर निर्भर है। हमें वह माहौल बनाना होगा, जहां महिलाएं उड़ान के सपने देख सकें।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)