• Hindi News
  • Opinion
  • Navneet Gurjar's Column A Needle Is Needed To Join The Patchwork Of Politics; Today The Common Man Wanders Away From Politics

नवनीत गुर्जर का कॉलम:राजनीति के चिथड़े जोड़ने के लिए एक सुई चाहिए; आज आम आदमी राजनीति से तौबा करता फिरता है

2 महीने पहले
  • कॉपी लिंक
नवनीत गुर्जर - Dainik Bhaskar
नवनीत गुर्जर

भारतीय राजनीति कौन-सी करवट लेने जा रही है? जनकल्याण और गरीबों के भले का उद्देश्य तिरोहित होता जा रहा है। पक्ष हो या विपक्ष, हर कोई अब एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करना ही अपनी राजनीति का एकमात्र उद्देश्य मान बैठा है।

कभी-कभी सोचने में आता है कि क्या यह राजनीतिक संसार सिमटकर चावल के दो दाने हो सकता है, जिसे किसी अज्ञात देवता की पूजा में सादर रखा जा सके? ...कि क्या यह राजनीतिक संसार कुछ देर के लिए ही सही, गोल होकर एक रोटी हो सकता है, जिसे कई दिनों से भूखी किसी बच्ची को चुपके से दिया जा सके?

नेताओं और आम आदमी के बीच के संबंध तो बुरे हाल में हैं। कई नेता हैं जिन्हें लोगों ने अपनी पलकों में बैठाए रखा लेकिन वही नेता, उन्हीं नजरों से गिरकर खुदकुशी करने से नहीं चूके! नजरें घुमाकर देखिए तो घरों में, दफ्तरों में और रास्तों पर जाने कितने श्मशान कायम हैं, जिनसे होकर आम आदमी को रोज गुजरना पड़ता है। चलते-फिरते मकबरों की जियारत रोज करनी पड़ रही है।

ये हालात बदलने चाहिए। राजनीति को सबके लिए सुलभ और सरल, सामान्य होना ही चाहिए। वैसे ही जैसे- दरिया के पानी पर गिरती हुई सुबह की नाजुक धूप। जैसे- खामोश दुपहरी में काली चट्टान पर बैठा सफेद परिंदा। जैसे- गोधूलि वेला में पानी पीती गायों की गर्दन पर लटकती-बजती घंटियां!

आज तो आम आदमी राजनीति से तौबा करता फिरता है और नेताओं से खौफ खाता है। नेताओं और आम आदमी के रिश्तों पर एक दंतकथा बड़ी मौजूं है, जो कुछ इस तरह है-

एक बार एक आदमी, एक नेता के पास गया। कहा- मुझे चूहा बनकर नहीं रहना, मुझे आपकी बिल्लियां बहुत डराती हैं। नेता ने कहा- जा बेटा, तू बिल्ला बन जा। वो बन गया बिल्ला। …और फिर उसे कुत्तों से डर लगने लगा। नेता जी ने समाधान सुझाया- जा बेटा, अब शिकारी कुत्ता बन जा। वो भी बन गया लेकिन अब शेर का खौफ सताने लगा। नेता जी के पास फंडों की कमी नहीं थी। फिर कहा- जा, अब शेर बन जा। अब शेर बनकर जीवनभर डर लगता है कि नेताजी कहीं वापस चूहा न बना दें!

कुल मिलाकर, जिन नेताओं को लोगों का प्रेम कमाना था, वे लोगों की नफरत कमाए बैठे हैं। पांच साल में एक बार घर या मोहल्ले में आते हैं, वोट मांगने। सिवाय इसके उनका लोगों से कोई वास्ता नहीं होता, ऐसी धारणा बनी हुई है। हो सकता है कुछ नेता अपवाद भी हों और वाकई लोगों के हितैषी बने हुए हों, लेकिन आम धारणा तो इस राजनीति, इस नेतागीरी के खिलाफ ही है।

कवि यतीन्द्र मिश्र की तर्ज पर कहें तो राजनीति से टूटे विश्वास को जोड़ने के लिए एक सुई चाहिए। हो सके तो एक दर्जी की उंगलियां भी। सौ-सौ चिथड़े जोड़कर एक बड़ी-सी गुदड़ी बनाने के लिए। एक साबुन चाहिए। हो सके तो धोबिन की धुलाई का मर्म भी। बीसों घड़ों का पानी उलीचकर, कामनाओं का चीकट धोने-सुखाने के लिए।

कई नेता हैं जिन्हें लोगों ने अपनी पलकों में बैठाए रखा लेकिन वही नेता, उन्हीं नजरों से गिरकर खुदकुशी करने से नहीं चूके! ये हालात बदलने चाहिए। राजनीति को सबके लिए सुलभ और सरल, सामान्य होना ही चाहिए।

…और अंत में एक झोला चाहिए। हो सके तो कवियों का संताप भी। अर्थ गंवा चुके ढेरों शब्दों को उठाकर, एक नई राह की खोज में जाने के लिए…!