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नवनीत गुर्जर का कॉलम:गुस्सा कोई कैर का अचार तो नहीं कि सालभर इकट्ठा होता रहे और अचानक त्योहारों पर उसमें स्वाद आने लगे!

19 दिन पहले
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नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर - Dainik Bhaskar
नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर

मध्यप्रदेश के खरगोन में कर्फ्यू, राजस्थान के करौली में झगड़ा और जोधपुर में सुनियोजित दंगे! क्यों? दरअसल, वोट पाने का सबसे अच्छा और आसान तरीका है- कौमों को लड़ाना। क्योंकि दंगों-झगड़ों के बाद ही कोई कौम इकट्ठा होती है। एक होती है। और फिर एकजाई वोट पड़ते हैं। कौमें जब तक राजनीतिक-धार्मिक नेताओं के इस सच को नहीं समझेंगी, झगड़े होते रहेंगे।

सबसे बड़ा संकट ये है कि प्रशासन या शासन जिसे स्टेट कहते हैं, जिसका अपना कोई धर्म नहीं होता, राजधर्म के सिवाय, वह हमेशा बीच के रास्ते ही चलता है। सच न तो कभी सामने लाता है, न ही ऐसा चाहता है। झगड़े इसलिए होते हैं। झगड़े इसलिए भी होते हैं कि इन मौकों पर भारी भीड़ होती है, भारी पुलिस बल होता है और ऐसे में किसी एक पुलिस जवान को कोई पत्थर लग जाता है... इसलिए भी कि बहुसंख्यक और अल्पसंख्यकों में बराबरी की बात करने वाला शासन ही सबकुछ बराबर नहीं करना चाहता। या राजनीति उसे ऐसा करने नहीं देती।

चाहे सरकार भाजपा की हो या कांग्रेस की! क्षेत्रीय दलों की तो बात भी करना बेमानी है। वे तो संतुलन के नाम पर एक पलड़े पर खुद खड़े होते हैं और दूसरे पलड़े पर सारी दुनिया को तौलते हैं। झगड़े इसलिए भी हो जाते हैं कि कभी उनके मोहल्ले से निकलते हुए ये, और कभी इनके मोहल्ले से निकलते हुए वे, जोर से नारा लगा देते हैं। अगर झगड़े की वजह ऐसी ही होती है तो मुख्य मुद्दे कहां हैं?... और जब हमें मुद्दे ही याद नहीं तो सवाल ये उठता है कि ये झगड़े होते ही क्यों है?

दरअसल, झगड़ा न तो हिंदू चाहता है, और न ही मुसलमान। कोई चार-छह लोग ही होते हैं- कभी एक पक्ष में, कभी दोनों पक्षों में, और कभी इस झगड़े को सुलझाने वाले प्रशासन में भी। ये ही कराते हैं सबकुछ। भुगतती है दोनों कौमें। मुसीबत होती है निरपराध पीड़ितों की। भुगतते वे हैं जो न इस तरफ से शामिल होते, न उस तरफ से। बीच में पिसते रहते हैं। सहते रहते हैं। उनका जीवन, जैसे गहरी रातों की खामोशी! उनका खानपान, जैसे गीतों की मिठास से देसीपन की शकर का हट जाना।

उनकी दिनचर्या, जैसे तबले के बोलों से तिरकिट का गायब हो जाना। उनकी खुशियां, जैसे जलतरंग के सुरों में से मध्यम वाली कटोरी के पानी का सूख जाना…! आखिर, इतना सारा सूनापन किसी के जीवन में लाकर ये दंगाई, ये प्रशासन और ये सरकारें कौन-सा सुशासन रचना चाहती हैं? कौन-सा सौहार्द बोना चाहती हैं? रामनवमी और ईद जैसे त्योहारों पर ही यह सब क्यों होता है? सालभर भी तो ये कौमें सौहार्द के साथ रहती हैं। मिलती-जुलती भी हैं। व्यापार-व्यवहार भी साझा करती हैं।

फिर त्योहारों पर ही इतना भारी गुस्सा, इतनी सारी नफरत, कहां से आती है। आखिर यह सब कोई कैर का अचार तो नहीं कि सालभर इकट्ठा होता रहे और अचानक किसी त्योहार पर उसमें स्वाद आने लगे! दरअसल, कोई प्रशासन, शासन या सरकार किसी कौम को बहका नहीं सकती। उनमें यह ताकत ही नहीं होती।

कौमें और उनका नेतृत्व जब कमजोर होता है तो वह खुद को सबल बनाने की खातिर इन सबके बहकावे में आता है। और आम नागरिक के तो क्या कहने! वह तो बैठा ही रहता है बहकने के लिए। जिसने जो कहा- मान लिया! जिधर कहा- चल दिए। जहां कहा- वोट डाल आए। आख़िर हम अपने मन की क्यों नहीं सुनते? कब तक दूसरों की सुनते रहेंगे?

भुगतता है निर्दोष पीड़ित
पीड़ितों का जीवन, जैसे गहरी रातों की खामोशी! उनका खानपान, जैसे गीतों की मिठास से देसीपन की शकर का हट जाना। उनकी दिनचर्या, जैसे तबले के बोलों से तिरकिट का गायब हो जाना। उनकी खुशियां, जैसे जलतरंग के सुरों में से मध्यम वाली कटोरी के पानी का सूख जाना…!