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नवनीत गुर्जर का कॉलम:तीसरी लहर आ गई पर किसी को कोई फ़िक्र ही नहीं, ढर्रा वही है- पुराना और घिसा-पिटा

5 महीने पहले
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नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर - Dainik Bhaskar
नवनीत गुर्जर, नेशनल एडिटर, दैनिक भास्कर

मौसम हर तरफ बिगड़ा हुआ है। मौसम के हिसाब से भी। बेरहम कोरोना के बढ़ते मामलों के कारण भी।…और इस सब के चलते वातावरण में अट्टहास करती नेताओं, सरकारों की उदासीनता की वजह से भी। अंधेरा बादलों की तरह घिरता जा रहा है और उदासी बूंद-बूंद बरस रही है। इस बीच अगर कुछ अच्छा हो रहा है तो वो ये कि 15 से 18 बरस के बीच के बच्चों का वैक्सीनेशन।

दरअसल, उम्र के ये कुछ ऐसे बरस होते हैं जिनके दरमियान अब तक का बहुत कुछ जाना-पहचाना, शरीर के कपड़ों की तरह तंग लगने लगता है। होंठ जिंदगी की प्यास से ख़ुश्क हो जाते हैं। आकाश के तारे जिन्हें बचपन में दूर से प्रणाम करने की हिदायतें दी जाती थीं, इस उम्र में उन्हीं तारों को पास जाकर छू लेने बल्कि तोड़ लेने को जी करता है।

ऐसे में ये वैक्सीनेशन! फिर भी युवा बड़े उत्साह के साथ इसे अपना रहे हैं। दरअसल, कोरोना की इस महामारी के चलते, इर्द-गिर्द, दूर- पास की हवाओं में इतनी मनाहियां, इतने इनकार और इतने विरोध तारी हो गए हैं कि आज के युवाओं की सांसों में आग सुलग उठती है। अच्छा है कि हर युवा इसका उपयोग एक अच्छे काम में कर रहा है। वैक्सीनेशन से केवल वही सुरक्षित नहीं होगा बल्कि उसके इस प्रयास से घर के बाकी छोटे सदस्यों को भी सुरक्षा मिलेगी जो इस तीसरे दौर या लहर में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।

अब बात करें सरकारी उदासीनता की तो वह हमेशा की तरह ही है। सरकारें दरअसल बदलती ही नहीं है। उनके काम और काम करने के तौर- तरीके तो एक जैसे होते ही हैं, उनकी लापरवाहियां या उदासीनता भी वैसी ही होती हैं। आखिरकार कुछ तो बदले! कारण एक ही है- सरकारों के बदलने से नेता, मंत्री तो बदलते हैं, लेकिन काम करने या करवाने वाले अफसर वही रहते हैं। बदलती है तो उनकी जगह।

जहां तक जगह का सवाल है, उसके बदलने से कुछ होता-जाता नहीं है। तीसरी लहर आ गई लेकिन खासकर, राज्य सरकारों का ढर्रा वही है- पुराना, घिसा-पिटा। ज्यादा केस आ रहे हैं तो टेस्टिंग घटा दो। केस कम बताओ। आज के कुछ कल पर, कल के कुछ परसों पर टालो! बाजारों, मॉल्स में लोग अभी भी बिना मास्क या आधे-अधूरे मास्क के साथ यहां-वहां स्वच्छंद विचरण कर रहे हैं। किसी को कोई फ़िक्र नहीं है।

न सरकार को, न उसके अफसरों को, और न ही उन आम लोगों को जिन पर सबसे बड़ा संकट आने का अंदेशा है। शादियों में लोगों की संख्या सीमित कर दी गई है तो उसके भी तोड़ निकाल लिए गए हैं। एक या दो दिन की शादी को चार-पांच दिन लंबा खींचकर टुकड़ों में हजार से ज्यादा लोगों को जिमाया जा रहा है।

अब जिन्हें अपनी या अपनों की ही फ़िक्र नहीं हो, उनसे आखिर क्या उम्मीद की जाए? और कोई सरकार, कोई पुलिस उनका क्या बिगाड़ सकती है? भाई लोग लगे हैं कोरोना को दावत देने में! ऐसी दावतों से समय रहते निजात नहीं पाई गई तो यकीनन हम अपनी ही नजर में गिर जाएंगे। कम से कम ऐसी नौबत तो किसी के जीवन में नहीं आनी चाहिए।