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थाॅमस एल. फ्रीडमैन का कॉलम:परमाणु समझौते पर फिर बातचीत, अमेरिका ईरान से कुछ अच्छे की उम्मीद नहीं कर सकता

6 महीने पहले
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थाॅमस एल. फ्रीडमैन, तीन बार पुलित्ज़र अवॉर्ड विजेता एवं ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में नियमित स्तंभकार - Dainik Bhaskar
थाॅमस एल. फ्रीडमैन, तीन बार पुलित्ज़र अवॉर्ड विजेता एवं ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में नियमित स्तंभकार

ईरान और अमेरिका में इस हफ्ते परमाणु समझौते पर बात हुई और इसमें कुछ प्रगति की खबरें हैं। लेकिन अमेरिका के लिए ईरान की इस्लामी शासन व्यवस्था के साथ काम करना अब भी कहीं न कहीं असंभव लगता है। ईरान आक्रमण करने के लिए बहुत बड़ा है, इसके शासन को गिराना मुश्किल है, अपने सुन्नी अरब पड़ोसियों पर हावी होने और यहूदी राज्य को नष्ट करने की उसकी स्याह उत्तेजना नजरअंदाज नहीं कर सकते और इसके लोग इतने प्रतिभाशाली हैं कि उन्हें हमेशा के लिए परमाणु क्षमता से वंचित नहीं रखा जा सकता। इसलिए ईरान का सामना करते हुए दो चीजें याद रखनी होंगी (1) कुछ भी पर्फेक्ट नहीं होगा (2) ईरान का इस्लामी शासन नहीं बदलेगा।

ईरान के सत्ताधारी मौलवी वर्षों से अमेरिका और इजरायल के बीच संघर्ष का लाभ उठाते रहे हैं और खुद को सत्ता में बनाए रखा है। 2015 के सौदे में अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों को उठाने से प्राप्त संसाधनों का उपयोग करने में शासन काफी खुश था, जिसका इस्तेमाल उसने ईरान समर्थक अरब शियाओं को धन और हथियार देने में भी किया, ताकि वे इराक, लेबनान, सीरिया व यमन में अरब सुन्नियों पर हावी हो सकें। इससे सुनिश्चित हुआ कि चारों कमजोर या असफल अरब राज्य बने रहें।

आज ईरान में राष्ट्रपति चुनाव का ढोंग होगा, जहां शासन द्वारा पहले से तय उम्मीदवारों में से ईरानी ‘आजादी’ से किसी को भी चुन सकेंगे। बेहद कम मतदान का अनुमान है। यह सब नहीं बदलेगा, जब तक अयतोल्लाह सत्ता में हैं। और वे जानते हैं कि अमेरिका और इजरायल के नेता कुछ भी कह लें, वे कभी अपनी परमाणु क्षमता नहीं छोड़ेंगे।

जैसा कि कहा जाता है, ‘समस्याओं के समाधान होते हैं, लेकिन दुविधाओं के सींग होते हैं।’ और इस ईरानी शासन के साथ संघर्ष का प्रबंधन स्थायी रूप से एक दुविधा पर अटके रहना है। यह वास्तविकता अमेरिका व इजरायल के बीच गंभीर दरार का कारण बन रही है। नई इजरायली सरकार भले इसे शांति से संभाले, वह जानती है कि बाइडेन कुछ अलग हैं। बाइडेन नए इजरालयी प्रधानमंत्री की हर बात नहीं मानेंगे।

उनका मुख्य उद्देश्य मध्य पूर्व में अमेरिकी हितों को सुरक्षित करना होगा। जैसे ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना, जो तुर्की व सभी अरब राज्यों को परमाणु हथियार हासिल करने पर मजबूर करेगा, जिससे पूरा इलाका वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा बन जाएगा।

बाइडेन की टीम कहती है कि वह इस खतरे को बातचीत के जरिए खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है, जिससे कि परमाणु समझौता फिर अस्तित्व में आ जाएगा। इसपर इजरायली पूछते हैं: धन्यवाद, लेकिन आप ढेर सारे प्रतिबंध हटा देंगे तो आपका क्या नियंत्रण रह जाएगा?

मेरे पास एक आइडिया है: अमेरिका व इजरायल के बीच तनाव खत्म करने का एक तरीका है कि बाइडेन नई कूटनीतिक पहल करें, कि अमेरिका सीरिया से ईरानियों को हटवाने का प्रयास करे। सीरिया आज विभिन्न क्षेत्रों में तीन गैर-अरब शक्तियों, रूस, तुर्की व ईरान द्वारा नियंत्रित है।

बाइडेन और खाड़ी अरब देश रूस और सीरियाई तानाशाह बशर अल-असद के पास यह ऑफर लेकर जाएं कि ईरानी सेनाओं को सीरिया से बाहर करो और ईरान जो वित्तीय सहायता सीरिया को देता है, हम उसे तिगुना कर देंगे और असद के अगली अवधि तक सत्ता में रहने पर सहमत होंगे। इजरायली सेना इसका समर्थन करेगी। हां यह एक स्वार्थी समझौता होगा। लेकिन मैं यही कहूंगा (1) यह मध्य पूर्व है दोस्तों और (2) समस्याओं के समाधान होते हैं, लेकिन दुविधाओं के सींग होते हैं।

( ये लेखक के अपने विचार हैं)