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एन. रघुरामन का कॉलम:‘प्लांट पैरेंटिंग’ से रोजगार के नए अवसर, नगरीय निकाय इस साल ऐसे लोगों की तलाश में रहेंगे

4 महीने पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

‘सर, मेरे दादाजी ने दशकों पहले आम का पेड़ लगाया था। दुर्भाग्यवश जब हम भाइयों ने पैतृक संपत्ति का बंटवारा किया, वह आम का पेड़ भाई की तरफ चला गया। क्या आपका संस्थान इस बड़े पेड़ को सिर्फ 15 फीट दूर, मेरे आंगन में शिफ्ट कर सकता है?’ लुधियाना में वेस्ट प्लास्टिक बोतलों से करीब 500 वर्टिकल गार्डन और 95 माइक्रो फॉरेस्ट बना चुके आईआरएस रोहित मेहरा को कुछ हफ्ते पहले अमृतसर से ऐसा फोन आया। वे पेड़ की जांच के लिए गए, जो विशाल था, लेकिन रोहित ने चुनौती स्वीकार कर शिफ्टिंग का काम शुरू किया।

मैंने रोहित को सोमवार सुबह फोन किया क्योंकि मुंबई की दो घटनाएं मुझे परेशान कर रही थीं। पहली, मई में ताऊते तूफान की वजह से मुंबई शहर में 2000 पेड़ गिरने की घटनाएं हुईं। कई पेड़ खतरनाक परिस्थिति में हैं जिन्हें जून की भारी बारिश नुकसान पहुंचा सकती है। विशेषज्ञ इसके लिए जड़ों पर डाली गई कंक्रीट को जिम्मेदार मानते हैं।

दूसरी, अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए 20-30 वर्ष के कई लोग जान जोखिम में डालकर मुंबई में कोविड केंद्रों पर काम कर रहे हैं क्योंकि महामारी ने उनकी नौकरी छीन ली। ये युवा, डॉक्टरों और प्रशिक्षित मेडीकल स्टाफ की मदद कर रहे हैं और 10 घंटे की शिफ्ट के लिए करीब 16,500 रुपए प्रतिमाह पा रहे हैं।

मुझे पता चला कि मुंबई के नागरिक प्राधिकरण अन्य पेड़ों के गिरने का जोखिम कम करने के लिए पेड़ों का ‘वैज्ञानिक जोखिम मूल्यांकन’ करवा रहे हैं, जिसे आर्बरिकल्चर (वृक्षसंवर्धन) कहते हैं और उनकी सेहत जानने के लिए ‘ट्री-सर्जन’ नियुक्त कर रहे हैं। मैं रोहित से जानना चाहता था कि क्या देश के युवा ऐसी नौकरियां कर सकते हैं क्योंकि हम पेड़ों की जिंदगी पर कम ध्यान देते हैं।

मेरी जानकारी में पेड़-पौधों का हॉस्पिटल चलाने वाले रोहित इकलौते इंसान हैं। पंजाब में यह भारत का अपनी तरह का पहला अस्पताल है, जिसकी अपनी एम्बुलेंस भी है। यह अस्पताल 32 प्रकार की सेवाएं देता है, जैसे कील निकालना, पेड़ बड़ा होने पर टीगार्ड हटाना, जहर खत्म करना, पौधे लगाना सिखाना, दीमक का उपचार, पेड़ों की शिफ्टिंग, छंटाई आदि। इसका मुफ्त हेल्पलाइन नंबर है, जहां पेड़ की फोटो भेजकर मुफ्त सलाह ले सकते हैं। रोहित के पास बॉटनिस्ट, ट्री-साइंटिस्ट, पर्यावरणविद, पौधों के विशेषज्ञों की टीम है, जो बिना केमिकल, प्राकृतिक तत्वों वाला उपचार बताते हैं।

रोहित के मुताबिक आधारभूत जानकारी और पेड़-पौधों के बारे में व्यावहारिक प्रशिक्षण लेकर युवा इस काम को अपने नगरीय निकायों के साथ बतौर गिग इकोनॉमी (फ्रीलांसर) कर सकते हैं, जैसे वे कोविड सेंटर में कर रहे हैं। मुंबई जैसे अमीर नगरीय निकायों में अर्बोरिस्ट मशहूर हैं, जिन्हें पेड़ के सौंदर्यीकरण और आर्बरीकल्चर के लिए नियुक्त करते हैं।

वे पेड़ के तनों पर रेजिस्टोग्राफ इस्तेमाल कर उसकी संरचनात्मक स्थिरता जांचते हैं और जरूरत पड़ने पर पेड़ का वजन कम करने के लिए छंटाई करते हैं तथा आसपास की कंक्रीट हटाकर जड़ों के लिए जगह बनाते हैं। रोहित मानते हैं कि भारत का पहले ही ‘वृक्षायुर्वेद’ का समृद्ध पारंपरिक ज्ञान है। इसे जल्दी अपनाएं क्योंकि विकासशील अर्थव्यवस्था में हाईवे बनेंगे और पेड़ों के रि-ट्रांसप्लांटेशन (पेड़ एक जगह से दूसरी जगह लगाना) की मांग रहेगी।

फंडा यह है कि इस बारिश कई ‘ट्री-सर्जन’ की जरूरत होगी। खुद को जल्द प्रशिक्षित करें क्योंकि हवा में ऑक्सीजन बढ़ाने के लिए दुनिया को ढेरों पेड़ों की जरूरत है और ज्यादातर नगरीय निकाय कम से कम इस साल तो ऐसे लोगों की तलाश में रहेंगे।