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एन.रघुरामन का कॉलम:जिम्मेदारी लेने का मतलब कठिन हालातों के लिए दोष लेना नहीं है

Opinion14 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

देश के अधिकांश शहरों में एक कॉमन दृश्य सबको परेशान करता है। डस्टबिन खाली होने के बावजूद कूड़ा उसके बाहर फैला रहता है। कचरा उठाने वाली टीम सबसे पहले बाहर फैला कूड़ा उठाकर मुख्य ट्रक में डालती है। ये उनके काम को दोगुना कर देता है, कर्मचारी खुद को हारा मानते हैं और अंतत: ‘चलता है’ एटीट्यूड घर कर जाता है। समाधान आसान है।

अगर हम शहर साफ चाहते हैं तो हमें कूड़े को डस्टबिन में डालने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए ना कि बाहर। पहला काम करेंगे तो सफाई कर्मियों का काम आसान होगा और ये कर्मी भी जितना हो सकेगा, उतना अपना क्षेत्र साफ रखेंगे। धीरे-धीरे शहर को स्वच्छ शहर का तमगा मिल जाएगा। सफाई के मामले में अगर कोई कहे कि कड़े नियम जैसे जुुर्माने आदि से पूरे शहर का कल्चर बदल सकता है तो मैं कहूंगा अपने कथन में वह ‘जिम्मेदारी’ नहीं ले रहे हैं।

यह तुलना मेरे दिमाग में तब आई जब मैंने फ्रांस में रहने वाली सिस्टर आंद्रे के बारे में सुना, दुनिया की सबसे बुजुर्ग आंद्रे का 119वें जन्मदिवस से 25 दिन पहले इस मंगलवार को निधन हो गया। वह जापान की केन तनाका का रिकॉर्ड नहीं तोड़ सकीं, केन का पिछले साल 19 अप्रैल को 119 साल-107 दिन की उम्र में निधन हुआ था।

केन के नाम दूसरे सबसे उम्रदराज इंसान का रिकॉर्ड है, पहले नंबर पर फ्रांस की जीन कैलमेंट हैं, जिनका 4 अगस्त 1997 को 122 साल-164 दिन की उम्र में निधन हुआ था। इंसानों की दीर्घायु पर काम कर रहे कई शोधकर्ताओं का मानना है कि जीन का रिकॉर्ड भी स्टेप बाय स्टेप टूटेगा, पहला व्यक्ति 124 साल तक पहुंचेगा, फिर कोई 127 तक, तीसरा 130 की उम्र छुएगा, ये इस सदी के खत्म होने से पहले होगा।

हालांकि हममें से अधिकांश लोग जिंदगी पूर्णता में जीना चाहते हैं, भले सिस्टर आंद्रे जितनी लंबी न हो, तब क्या हम उस उपलब्धि को हासिल करने की ज़िम्मेदारी दिखाते हैं? मेरा पक्का मानना है कि हम इंसानों ने ‘जिम्मेदारी’ लेने का अर्थ धीरे-धीरे समझना शुरू कर दिया है। हेल्थकेयर में सब जगह शोध हो रहे हैं।

दशकों के भ्रामक व कभी-कभी विरोधाभासी शोध (बहुत ज्यादा एल्कोहल खराब है। थोड़ी मात्रा अच्छी है। बाकियों की तुलना में कुछ प्रकार की एल्कोहल बेहतर है) के बाद तस्वीर अब कुछ-कुछ साफ हो रही है : हाल ही में जारी शोध में कहा गया कि शराब की थोड़ी-सी मात्रा के भी दुष्प्रभाव हो सकते हैं।

अधिकांश आईटी प्रेमी आबादी भी समझ गई है कि हम मोबाइल- एयरपॉड्स के साथ पैदा नहीं हुए थे। उन्होंने भी इन आधुनिक उपकरणों से धीरे-धीरे खुद को दूर करना शुरू कर दिया है और पांचों इंद्रियों को आराम दे रहे हैं। नहीं तो उठने से सोने तक, हम आंखों या कानों से दिमाग को कुछ न कुछ जानकारी देते रहते हैं। डिजिटल डिटॉक्सिफिकेशन नया चलन है, जो अधिकांश लोग कर रहे हैं।

जैसे दशकों पहले हम हफ्ते में एक बार या तय दिन उपवास करते थे, कुछ लोग अब ‘नो मोबाइल डे’ मना रहे हैं और आंखों-कानों के लिए टेक्नोलॉजी का उपवास करा रहे हैं। ‘स्क्रीन पर निर्भरता’ घटाने के लिए युवा नेचर ट्रेल्स का आयोजन कर रहे हैं। आसपास योग क्लासेस, लाफ्टर क्लब, स्टोरी टैलिंग सेशन व बाकी कई गतिविधियों की संख्या देखिए, जो कि मसल्स को आराम देने के साथ तनाव कम करती हैं।

आज वॉकिंग, रोज नहाने जैसी रेगुलर हो गई है, नई पीढ़ी को धन्यवाद है, जो हेल्थ केयर के मामले में हमसे बहुत आगे निकल गई है। फंडा यह है कि जिम्मेदारी लेने का मतलब कठिन हालातों के लिए दोष लेना नहीं है, यह केवल उस भूमिका को पहचानना है जो हम उन्हें सुधारने में निभा सकते हैं, शायद किसी भी कारण से।