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एन. रघुरामन का कॉलम:बुढ़ापा खूबसूरत हो सकता है, अगर बुजुर्ग युवाओं के लिए बाधा नहीं, बल्कि मार्गदर्शक बनें

10 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

इस साल 14 फरवरी को वैलेंटाइन डे का भारतीय स्वरूप ‘मातृ-पितृ पूजन दिवस’ देखने को मिला, जिसके तहत बेंगलुरू के सामाजिक संगठन ‘बीइंग सोशल’ ने वृद्धाश्रम के वरिष्ठ नागरिकों का सम्मान किया। इस ‘प्यार वही, सोच नई’ की धारणा के पीछे बच्चों को यह संदेश था कि वे अपने मां-बाप को न छोड़ें। लेकिन मेरा सवाल है कि इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है?

इसमें हमेशा दो सोच होंगी। एक युवाओं का साथ देगी और दूसरी बुजुर्गों का। लेकिन मैं ऐसे लोगों को जानता हूं जो मानते हैं कि बुजुर्गों को ही सामंजस्य बैठाना पड़ता है क्योंकि उनके पास जिंदगी का ज्यादा अनुभव है। ओमप्रकाश भटनागर उनमें से एक थे। वे इंदौर के संजना पार्क इलाके में रहते थे, जहां शीर्ष रिटायर्ड गैजेटेड अधिकारी रहते हैं। एक दिन उन्होंने अपने बेटे को चटख लाल शर्ट पहनकर जाते देखा। आपत्ति जताने की बजाय उन्होंने टिप्पणी कि यह रंग उस पर अच्छा नहीं लग रहा।

बेटे ने उनकी बात अनसुनी कर दी। उसकी स्टाइल देख उसके एक दोस्त ने भी वैसी ही गहरे लाल रंग की शर्ट खरीदकर पहनी। फिर वह दोस्त अपने खाते से पैसे निकालने के लिए बैंक ऑफ बड़ौदा की गोयल नगर ब्रांच गया। संयोग से उस दिन वहां एक लूट हुई और सीसीटीवी में पुलिस को ऐसे रंग की शर्ट में लड़के को देखकर कुछ शक हुआ। उस दोस्त को पूछताछ के लिए बुलाया गया। तब ओमप्रकाश के बेटे को अहसास हुआ कि पिता का टोकना जायज़ था।

ओमप्रकाश ने बेटे के शराब पीने पर कभी आपत्ति नहीं जताई। लेकिन उन्हें यह पसंद नहीं था। इसलिए जब भी बेटे के दोस्त घर आकर डिनर के समय शराब पीते, तो ओमप्रकाश सेहत संबंधी कारण बताकर ऊपरी मंजिल पर चले जाते और उस शाम अपने कमरे से बाहर ही नहीं आते। लेकिन वो कभी बच्चों को गुस्सा नहीं दिखाते थे। वे हमेशा मानते थे कि ‘मैंने अपनी जिंदगी अपने मुताबिक जी और अब बच्चों का जिंदगी जीने का अपना फलसफा है।

इसलिए हमें चिंता जतानी चाहिए लेकिन कभी अपने फैसले उन पर थोपना नहीं चाहिए।’ हालांकि उनका डिनर का समय तय था, लेकिन कभी-कभी उनका बेटा-बहू देर से घर आते थे। इस पर ओमप्रकाश उनसे मुस्कुराते हुए कहते कि आज तो मुझे खाना बनाने में प्रयोग करने का मौका मिल गया और उन्होंने डिनर कर लिया है। और वे वाकई खाना खा चुके होते थे।

मुझे एक और घटना याद है, जब उनकी नातिन पुणे में पढ़ने जा रही थी तो उन्होंने बेटी और दामाद को अपने कमरे में बुलाकर यूं ही कहा, ‘अगर वो प्रेम विवाह कर ले तो बुरा मत मानना।’ परिवार ने उनकी सलाह को नकारात्मक रूप से लिया और कहा कि ये बुजुर्ग नहीं चाहते कि महिलाएं ज्यादा पढ़ें-लिखें। लेकिन उन्हें उनके शब्दों का अहसास तब हुआ जब नातिन ने प्रेम विवाह किया।

लेकिन उनकी चिंता ने परिवार को ऐसी स्थिति का सामना करने के लिए तैयार कर दिया था और परिवार ने प्रेम विवाह के प्रस्ताव को सहजता से स्वीकार लिया। ओमप्रकाश के बारे में सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात परिवार वालों को उनके अंतिम संस्कार के बाद पता चली।

बतौर खंड विकास अधिकारी, मप्र में विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट काम करने के लिए उन्हें खुद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से सराहना पत्र मिला था। परिवार को यह तब पता चला, जब सांत्वना देने आए लोगों ने यह बताया।मैंने उनसे सीखा कि बुजुर्गों की युवाओं से बड़ी उम्मीदें होनी चाहिए और जब भी युवा भटकें तो उन्हें टोकते रहना चाहिए, लेकिन अगर वह उम्मीद पूरी नहीं होती है तो बुजुर्गों को निराश भी नहीं होना चाहिए।

फंडा यह है कि बुढ़ापा खूबसूरत हो सकता है, अगर बुजुर्ग युवाओं के लिए बाधा नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और मदद करने वाले बनें।

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