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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:किसी दौर में अपना वादा निभाने के लिए लोग अपनी जान तक दे देते थे, पर अब ये सिर्फ नैतिकता का पाठ बनकर रह गए हैं

18 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

मुकुल आनंद की अमिताभ बच्चन और श्रीदेवी अभिनीत फिल्म ‘खुदा गवाह’ में काबुल का एक पठान उस अपराध में दंडित किया जाता है, जो उसने किया ही नहीं था। गौरतलब है कि राजपूत जेलर अपने मेहनती कैदी के अच्छे आचरण से बहुत प्रभावित होता है। दोनों में मानवीय करुणा का रिश्ता बनता है। रवींद्रनाथ टैगोर की कथा ‘काबुलीवाला’ में भी बादाम-पिस्ते बेचने वाला पठान एक मिनी नामक बच्ची में अपनी बेटी की शक्ल देखता है। इस कन्या के पिता बार-बार उसे पैसे देने का भी प्रयास करते हैं।

बहरहाल, मुकुल आनंद की फिल्म ‘खुदा गवाह’ में पठान, जेलर से प्रार्थना करता है कि उसे पैरोल पर मात्र कुछ दिनों के लिए काबुल जाने की इजाजत दे। उसने किसी से शादी का वादा किया है और उसकी होने वाली दुल्हन उसके इंतजार में है। जेलर ने उसके लौटने के वादे पर ऐतबार किया और पठान ने भी शादी करके अपने लौटने का वादा निभाया। वह शादी के अगले ही दिन वह लौट जाता है।

चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कथा में लहना सिंह नामक सैनिक पात्र अपने बचपन में मिली एक कन्या से एक वादा करता है। उनका वार्तालाप हमेशा इस वाक्य से प्रारंभ होता है कि ‘तेरी कुड़माई हो गई?’ कालांतर में कन्या का विवाह होता है और उसका पुत्र सेना में भर्ती होता है। उस कन्या की लहना सिंह से मुलाकात होती है वह लहना सिंह से यह वादा लेती है कि संकट के समय वह उसके सैनिक पुत्र की सहायता करे।

कालांतर में एक युद्ध के समय लहना सिंह अपने वादे के अनुसार अपने बचपन की मित्र के पुत्र को बचाते हुए अपने प्राण दे देता है। मरने के पहले वह कहता है कि यह साहस का कार्य उसने इसलिए किया है कि बचपन में उसने अपनी पड़ोसन से यह वादा किया था। गुलेरी की कथा ‘उसने कहा था’ से प्रेरित फिल्म बिमल रॉय ने बनाई थी।

किसी दौर में अपना वादा निभाने के लिए लोग अपने प्राण भी देते रहे हैं। वर्तमान में तो व्यवस्था गणतंत्र के न्याय मंदिर में दिए गए हलफनामे के विरुद्ध जाकर अपनी सुविधा के काम करती रही है। किसी दौर में व्यक्ति अपनी मूंछ का एक बाल गिरवी रखकर महाजन से पैसा लेता था और बाल की खातिर अपना सब कुछ खोने को तैयार रहता था।

फिल्म ‘उपकार’ में गीत के बोल थे ‘कसमे वादे प्यार वफ़ा सब, बातें हैं बातों का क्या।’ राज कपूर और महमूद अभिनीत फिल्म ‘परवरिश’ में गीत है, ‘वादे भुला दें कसम तोड़ दें वो, हालत पे अपनी हमें छोड़ दें वो।’ रवींद्रनाथ टैगोर की कथा ‘काबुलीवाला’ पर बांग्ला भाषा और हिंदी भाषा में भी फिल्में बनी हैं। हिंदी में बनी फिल्म में बलराज साहनी ने अभिनय किया था।

ज्ञातव्य है कि इप्टा रंगमंच संस्था में सक्रिय फिल्मकार रमेश तलवार ने काबुलीवाला कथा के अगले भाग का आकल्पन यूं किया था कि पठान जिस मुन्नी को काजू-बादाम मुफ्त में देता था, वह मुन्नी जवान होकर डॉक्टर बनती है। वह एक पांच सितारा अस्पताल में मिले अवसर को ठुकरा कर युद्धग्रस्त अफगानिस्तान जाकर घायलों का इलाज करना पसंद करती है।

वेतन कम है और जोखिम अधिक है। उसे यह असंभव सी आशा है कि शायद उस काबुली वाले के वंश का कोई घायल, अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस संस्था द्वारा स्थापित कैंप में इलाज के लिए आए और वह अपनी भावना का कर्ज चुका सके। रमेश तलवार का यह नाटक कई बार मंचित हुआ है। प्रभात फिल्म कंपनी में काम करते समय देव आनंद और गुरुदत्त ने सक्षम होने पर एक-दूसरे को अवसर देने का वादा किया था, जिसे निभाया भी गया। गालिब का शेर है, ‘क्या गजब किया, वादे पर तेरे एतबार किया।’ दरअसल इतने वादे तोड़े गए हैं कि अब अगर किसी वादे को निभा दें तो शरीर पर चिकोटी काट कर देखता हूं कि यह सपना है या सच्चाई।

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