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  • One Day Has Passed, But It Is Not Just The Rituals, Especially Then; 100 Lakh Hectares Of Forest Per Year

डाॅ. अनिल प्रकाश जोशी का कॉलम:वन दिवस तो गुजर गया, मगर यह सिर्फ रस्म अदायगी भर न रह जाए, खासतौर से तब जब प्रति वर्ष 100 लाख हेक्टेयर वन खत्म हो रहे हों

7 महीने पहले
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डाॅ. अनिल प्रकाश जोशी, पद्मश्री से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता, हिमालयन पर्यावरण अध्ययन और संरक्षण संगठन के संस्थापक - Dainik Bhaskar
डाॅ. अनिल प्रकाश जोशी, पद्मश्री से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता, हिमालयन पर्यावरण अध्ययन और संरक्षण संगठन के संस्थापक

21 मार्च वन दिवस तो गुजर गया, मगर यह सिर्फ रस्म अदायगी भर न रह जाए। इस बार की थीम फाॅरेस्ट रेस्टोरेशन मतलब इनके संरक्षण से जुड़ी है। इसमें साफ है कि ये प्राकृतिक वनों के विस्तार व उनकी बहाली से संदर्भित है। ये बिलकुल सच भी है, आज अगर दुनिया में वनों को लेकर कोई बड़ी चिंता है तो वो प्राकृतिक वनों के संरक्षण की है। खासतौर से तब, जब प्रति वर्ष 100 लाख हेक्टेयर वन खत्म हो रहे हों और प्रति व्यक्ति वनों का क्षेत्र घट रहा हो।

पर शायद सबसे पहले हमें वनों के महत्व को नए सिरे से सबके सामने रखना और सबको इस तथ्य से जोड़ना होगा कि वन विहीनता, हमें जीवन विहीन कर देगा। जीवन की कोई भी आवश्यकता ऐसी नहीं है जो अंततः वनों से न जुड़ी हो। वन भारत की संस्कृति का हिस्सा हैं। पर दुर्भाग्य है कि हमारे देश में वनों के हालात बेहतर नहीं कहे जा सकते। साल 1980 में सरकारों ने गंभीरता दिखाते हुए एक वन नीति को लाने की कोशिश की, जिसके अनुसार किसी भी राज्य और देश में 33 फीसदी वनभूमि होनी चाहिए।

पर एकाध राज्य ही है, जहां 33 फीसदी वनों का दावा किया जा सकता है। हरियाणा-पंजाब जैसे हरित क्रांति के राज्य वन विहीन हैं। उत्तरप्रदेश में यह 4-5% ही है, बिहार में 7, पश्चिम बंगाल में 14 फीसदी। यह आंकड़ा अपेक्षित क्षेत्र की तुलना में बहुत कम है। हां हिमालयी राज्य उत्तराखंड और मध्यप्रदेश व झारखंड जैसे राज्य निश्चित रूप से वनाच्छादित हैं और यही कारण है कि देश में आज लगभग 21.6 फीसदी भूमि में वन पाए जाते हैं।

एक बड़ा पहलू वनों की स्थिति को लेकर भी है। क्या यह बेहतर वन के दर्जे में आते हैं? वनों की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि उनकी दशा कैसी है और साथ में किस प्रजाति की भागीदारी ज्यादा है। अगर वन प्रजातियां पारिस्थितिकी दृष्टि के अनुरूप नहीं है तो निश्चित रूप से वह बेहतर नहीं कहे जा सकते। उदाहरण के लिए हिमालयी क्षेत्रों में चीड़ के वन, बेहतर वन की श्रेणी में नहीं आते क्योंकि इनका पारिस्थितिकी योगदान उस दर्जे का नहीं है, जो कि हिमालय के लिए अपेक्षित है।

हां, आर्थिक दृष्टिकोण से जरूर महत्व हो सकता है, क्योंकि यह लीसा (रेजिन) के रूप में ज्यादा जाना जाता है। अगर सवाल पारिस्थितिकी और पर्यावरण का है, तो वृक्षों की प्रजाति, जो क्षेत्र विशेष के साथ जुड़ी है उसका योगदान ज्यादा महत्वपूर्ण है न कि मात्र वृक्ष का। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि अगर हिमालय क्षेत्र में सागौन या यूकेलिप्टस की बहुतायत हो तो वह अच्छे वन क्षेत्र तो बन सकते हैं पर बेहतर वन की श्रेणी में नहीं आएंगे।

और ऐसा उन सभी प्रजातियों के लिए समझना जरूरी है जिनका पारिस्थितिकी दृष्टिकोण से कोई योगदान ना हो। शास्त्रों में कहा गया है कि एक वृक्ष सौ पुत्र समान, मतलब 100 पुत्र उतनी सेवा नहीं करते जितना कि मात्र एक वृक्ष करता है और यह सही भी है। एक वृक्ष एक किमी तक शुद्ध प्राणवायु फैला सकता है। दुनिया की इस बढ़ती आबादी के लिए हमें आज एक हजार अरब वृक्ष चाहिए जो करीब 810 अरब टन कार्बन डाइ-ऑक्साइड को शोषित कर सकें।

एक अध्ययन में सामने आया कि दुनिया में तीन चौथाई इलाकों में बेहतर पानी का कारण वहां के बेहतर वन ही रहे। दुनिया में जो बड़े 230 जलागम हैं, उनमें 40 फीसदी जलागमों में 50% तक वनों की क्षति हुई है और अगर ऐसा ही होता रहा तो आने वाले समय में हमें भीषणजल संकट का सामना करना पड़ेगा। हमें यह भी समझ लेना चाहिए की यह वन ही हैं जो बढ़ते जलवायु परिवर्तन को हमारे हित में साध सकते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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