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हरिवंश का कॉलम:संकट में सिर्फ सामाजिक रिश्ते ही हमारी जान बचा सकते हैं, लोग महामारी में एक-दूसरे के प्रति दायित्व भूल गए

9 दिन पहले
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हरिवंश, राज्यसभा के उपसभापति - Dainik Bhaskar
हरिवंश, राज्यसभा के उपसभापति

‘दुनिया को, नया सामाजिक रिश्ता ही बचा सकता है’। इस निष्कर्ष के साथ किताब आई है ‘व्हाट वी ओ इच अदर’। यानी हमारा एक दूसरे के प्रति फर्ज, ऋण या आपसी दायित्व क्या है? इसकी लेखिका प्रो मिनोच शफ़ीक, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस की डायरेक्टर हैं। वे मानती हैं कि संसार में सब फलें-फूलें, इसके लिए सामाजिक सहकार जरूरी है। समाज में आपसी सहयोग से ही सामाजिक अनुबंध बनता है। दुनिया के सभी समाजों में लोगों से अपेक्षा होती है कि समाज कल्याण में वे योगदान करें।

मिनोच मानती हैं कि मौजूदा सामाजिक अनुबंध टूट चुके हैं। तकनीकी बदलाव, कामकाज के बदले स्वरूप, श्रम बाजार में पढ़ी-लिखी महिला वर्ग के आगमन, अधिक उम्र जीने वाली बढ़ी जनसंख्या और पर्यावरण परिवर्तन से। उनकी नजर में नया सामाजिक करार संभव है, जिसमें लोगों को सुरक्षा व अवसर मिल सकते हैं।

इस कसौटी पर भारत के सामाजिक रिश्तों की तस्वीर क्या है? देश कोरोना के कहर की चपेट में है। रेमडेसिविर इंजेक्शन की कालाबाजारी, ऑक्सीजन सिलिंडर, ऑक्सीमीटर, आदि की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी, दवा व बेड दिलवाने के नाम पर ऑनलाइन ठगी की अनगिनत खबरें आ रही हैं। कहां है हमारा एक दूसरे के प्रति दायित्व? शुरू से गांव देखा। विवाह, बीमारी, जीना-मरना, सब में लोग एक दूसरे के साथ खड़े रहते थे।

हजारों वर्षों से यह सामाजिक सहकार ही भारत की मुख्य ताकत रहा है। आज दुनिया अनेक खतरों से घिरी है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के कार्यकारी निदेशक बिरोल का कहना है कि कोरोना महामारी से उबरी अर्थव्यवस्था जलवायु के लिए कतई टिकाऊ नहीं है। सरकारें तेजी से कार्बन उत्सर्जन में कटौती नहीं की, तो 2022 ज्यादा भयावह होगा।

जीवन चक्र का संतुलन गड़बड़ है। बढ़ती आबादी और कम होते रिसोर्सेज की चुनौती अलग है। क्या मौजूदा विकास के अनिवार्य परिणाम हैं, सामाजिक अलगाव, व्यक्तिवाद। नई सामाजिक तहजीब से ही 21वीं सदी की दुनिया का भविष्य संभव है। पुरानी व्यवस्था को नए बदलावों ने ध्वस्त कर दिया है।

यह हालात देखकर वर्धा के सेवाग्राम में ‘गांधी कुटीर’ के आगे लगे गांधी का यह उद्धरण कौंधता है, ‘अपनी आवश्यकता बढ़ाते रहने की पागल दौड़ में जो लोग आज लगे हैं, वे निरर्थक मान रहे हैं कि इस तरह खुद अपने सत्व मेंं वृद्धि कर रहे हैं, उन सबके लिए हम यह क्या कर बैठे? ऐसा सवाल पूछने का समय एक दिन आए बगैर रहेगा नहीं।’

अनेक संस्कृतियां आईं-गईंं, लेकिन प्रगति की बड़ी-बड़ी बढ़तों के बावजूद भी मुझे बार-बार पूछने का मन होता है कि यह सब किसलिए? डार्विन के समकालीन वॉलेस ने कहा है कि नई-नई खोजों के बावजूद 50 वर्षों में मानव जाति की नैतिक ऊंचाई एक इंच भी नहीं बढ़ी। टॉलस्टॉय ने यही बात कही, ईसा मसीह, बुद्ध और मोहम्मद पैगंबर, सभी ने एक ही बात कही है।’
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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