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रीतिका खेड़ा का कॉलम:ऊंची-ऊंची बातें करने से किसी का स्वास्थ्य नहीं सुधरता, आगे चलकर लोगों को इसका खामियाजा भरना पड़ेगा

8 महीने पहले
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रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं - Dainik Bhaskar
रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं

कुछ दिनों पहले किसी ने सलाह दी कि बड़ी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी अभी खरीद लो। जैसे-जैसे उम्र बढ़ेगी, प्रीमियम बढ़ता जाएगा। मैंने कहा कि जरूरत पड़ने पर एम्स या सफदरजंग जैसे अस्पताल में मुफ्त इलाज हो सकता है। सलाहकार ने मुझे शक की नजर से देखा। सबके लिए मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं उनके लिए अकल्पनीय थीं।

वास्तव में, कई देशों में स्वास्थ्य सेवाएं मुफ्त हैं। छात्र के रूप में इंग्लैंड जाना हुआ, तो मां को एक ही फिक्र थी कि बीमार होगी, तो क्या होगा? इंग्लैंड में ‘नेशनल हेल्थ सर्विस’ सबको मुफ्त इलाज देती है। आप पड़ोस के नर्स या डॉक्टर के पास कभी भी जा सकते हैं। खर्च पूरी तरह से सरकारी राजस्व से होता है।

जर्मनी में निजी डॉक्टर हैं, लेकिन सबके पास इंश्योरेंस पॉलिसी होती है। जो इंश्योरेंस फंड बीमा प्रदान करते हैं, वे नॉट-फॉर-प्रॉफिट होते हैं। यानी, वे कानूनी तौर पर मुनाफा नहीं कमा सकते। बीमा का खर्च व्यक्ति, काम देने वाली कंपनी और सरकार के बीच बांटा जाता है। चूंकि पूरी आबादी योगदान देती है और कंपनी मुनाफा नहीं कमा सकती, लोगों को कम दाम में अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं मिलती हैं।

इन विकसित देशों में सरकार जीडीपी का 8% स्वास्थ्य पर खर्च करती हैं। ब्राजील, रूस व दक्षिण अफ्रीका में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च जीडीपी का 3-5% है। पड़ोस में नेपाल जीडीपी का लगभग 1.5% स्वास्थ्य पर खर्च करता है। भारत में हम 1% स्वास्थ्य पर खर्च करते हैं। इस साल महामारी के चलते उम्मीद बनी कि देश में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च बढ़ेगा। आर्थिक सर्वेक्षण में स्वास्थ्य पर अध्याय है, जिसमें स्वास्थ्य खर्च को 1% से 3% पर लाने की बात है।

चर्चा शुरू सही रास्ते पर होती है (स्वास्थ्य के लिए निजी क्षेत्र पर निर्भर रहने से कैसे नुकसान हैं)। बावजूद इसके, उपाय के रूप में निजी बीमा और सेवाओं पर निर्भर मॉडल ही सुझाया गया है। बजट में दर्शाया गया कि स्वास्थ्य बजट में बड़ी बढ़ोतरी हुई है। लगभग दो लाख करोड़ रुपए यानी 137% बढ़त। लेकिन इसमें आधा पेयजल और सैनिटेशन विभाग का बजट है, जिसे आमतौर पर स्वास्थ्य बजट में नहीं गिनते। बढ़त का बड़ा हिस्सा कोरोना वैक्सीन (35,000 करोड़ रु.) और पेयजल विभाग में इनफ्रास्ट्रक्चर (50,000 करोड़) पर है।

देशभर से खबरें आईं कि डॉक्टर, नर्स, अन्य अस्पताल कर्मी हड़ताल पर इसलिए हैं क्योंकि कई महीनों से उन्हें सैलरी नहीं दी गई। लेकिन सरकार ने मुख्यतः निर्माण कार्य का बजट बढ़ाया है। दूसरी जरूरत है कि सरकार स्वास्थ्य खर्च को प्राथमिक चिकित्सा (जो निवारक होती है) की ओर मोड़े। पिछले कई सालों से जब स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च बढ़ा, तो उपचार पर (निवारक पर नहीं) बढ़ाया गया।

जिस स्वास्थ्य मॉडल में उपचार पर, निवारक से ज्यादा खर्च होता है, वह महंगा होता है और परिणाम भी अच्छे नहीं होते। स्वास्थ्य बीमा पर निर्भर मॉडल का मतलब है कि सरकार पैर में छोटे से घाव पर खर्च नहीं करेगी। लेकिन जब घाव गैंग्रीन हो जाएगा और पैर को काटने की जरूरत होगी, तब सरकार उपचार पर खर्च करेगी। राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना व आयुष्मान भारत जैसी नीतियों में यही त्रुटि है। केवल बड़ी बीमारी और अस्पताल में दाखिल होने की स्थिति में ही वह मददगार है। खैर इस बजट में आयुष्मान भारत का बजट भी नहीं बढ़ा।

वास्तव में पिछले साल के पोषण खर्च में बड़ी गिरावट आई है। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना, गर्भवती और शिशुवती महिलाओं को रु. 5000 मदद के रूप में देती है। उसका पिछले साल का बजट रु. 2500 करोड़ था, जिसमें खर्च रु. 1300 करोड़ हुआ। यानी आंगनवाड़ी सेवाओं में पिछले साल का बजट खर्च नहीं हुआ और इस साल आंगनवाड़ी योजना को तीन अन्य योजनाओं के साथ ‘सक्षम’ के रूप में पेश किया गया। फिर भी, सक्षम का बजट पिछले साल की केवल आंगनवाड़ी योजना के बजट से भी कम है। ऐसी दावेबाजी से भले ही सरकार लोगों को बहला ले, लेकिन आगे चलकर लोगों को इसका खामियाजा भरना पड़ेगा।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)