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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:वास्तविकता ये है कि मनुष्य अपने चेहरे पर उभरे भाव को बदल सकने में समर्थ है

4 महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

यू.सी बर्कले और गूगल, मशीन द्वारा स्थिर चित्रों का अध्ययन कर रहे हैं। क्या समय बीतने पर स्थित चित्रों में चेहरों पर भावना में कोई बदलाव आता है? 140 देशों से 600 चित्रों का अध्ययन किया गया है। क्या कोरोना महामारी के दिनों मोनालिसा पेंटिंग के चेहरे की रहस्यमई मुस्कान का कोई नया अर्थ मिल पाया है?

लिओनार्दो दा विंची द्वारा बनाया गया मोनालिसा चित्र हमेशा सराहा गया है। संसार में चित्र की फोटो कॉपी सबसे अधिक बिकी है। लिओनार्दो दा विंची ने ईसा मसीह द्वारा किए गए आखिरी भोजन का चित्र बनाने में 7 वर्ष का समय लिया। प्रभु ईसा के चित्र के लिए पियात्रा नामक मॉडल चुना गया था। जूडास के विश्वासघात के कारण ईसा मसीह को सूली पर लटकाया गया था। अत: जूडास की पेंटिंग के लिए दुष्ट व्यक्ति को मॉडल लेना था। पेंटर ने जेल से एक कैदी को इस काम के लिए चुना था।

विचित्र तथ्य यह है कि दुष्ट जूडास के चित्र के लिए मॉडलिंग करते समय पियोत्रा सरल-सीधा व्यक्ति था परंतु कुछ वर्षा के पश्चात जब उसे ईसा की पेंटिंग के लिए चुना गया तब वह अपराध कर चुका था। सारांश यह है कि मनुष्य अपने चेहरे पर उभरे भाव को बदल सकने में समर्थ है।

कुछ लोग अपनी दाढ़ी बढ़ा लेते हैं ताकि उन्हें साधु-संत समझा जाए परंतु क्रूरता द्वारा अपनाया गया यह मुखौटा अधिक लोगों को अधिक समय तक अंधकार में नहीं रख पाता। मशीन द्वारा चेहरा पढ़ने को डीप न्यूट्रल विधि कहा जाता है।

ज्ञातव्य है कि डोरियन ग्रे के स्थिर चित्र में समय गुजर जाने पर भाव परिवर्तन देखा गया था। तर्क इस तरह की बात को स्वीकार नहीं करता परंतु यह कभी-कभी घटने वाला अजूबा है। विज्ञान तो पूर्व जन्म धारण को भी अस्वीकार करता है परंतु जर्मनी के डॉक्टर वीज ने इस विषय पर शोध किया है। उनके पास कुछ प्रमाण हैं। ज्ञातव्य है बिमल रॉय की सफलतम फिल्म मधुमती जन्म-जन्मांतर की प्रेम कहानी है।

इंग्लैंड में स्थिर चित्र लेने वाले कैमरे आविष्कार का उद्देश्य था कि चित्र रोग के निदान में मदद करेंगे। इसी क्षेत्र में अब एम.आर.आई द्वारा शरीर की सभी मांस पेशियों के चित्र लिए जाते हैं। फ्रांस के शोध करने वालों का उद्देश्य था कि कथा चित्र बनाए जा सकेंगे। आज भारतीय फिल्में विदेश में अच्छा व्यवसाय कर रही हैं।

सिनेमा की अपनी भाषा और व्याकरण है। सभी देशों में अवाम फिल्म समझ लेता है। उसे भाषा की बैसाखियों की आवश्यकता नहीं है। दरअसल अमेरिका-इंग्लैंड और फ्रांस को अपने-अपने उद्देश्य पाने में सफलता मिली। महामारी के दौर में हमने चेहरे पर मास्क लगाए। क्या मोनालिसा के चेहरे पर मास्क लगाने से वह अधिक रहस्यमय बन जाता है?‘हमने असली-नकली चेहरे देखे, क्या-क्या ख्वाब सुनहरे देखे और हमें मिली बेरोज़गारी, हताशा, अन्याय व असमानता।

एक प्राकृतिक आपदा में अनगिनत लोग मर गए। कुछ लोग भव सागर पार कर गए। नदी के किनारे एक शिशु के शव के चित्र पर विष्णु खरे ने ‘आलैन’ नामक कविता लिखी, हमने कितने प्यार से नहलाया था तुझे, कितने अच्छे साफ कपड़े पहनाए थे, तेरे घने काले बाल संवारे थे, तेरे नन्हें पैरों को चूमने के बाद, जूते के तस्मे मैंने ही कसे थे, गालिब ने सताने के लिए तेरे गालों पर गीला प्यार किया था, जिसे तूने हमेशा के लिए पोंछ दिया, और अब तू यहां आकर गीली रेत पर सो गया, दूसरे किनारे की तरफ देखते हुए तेरी आंख लग गई होगी, वह किनारा दूर नहीं था, जहां तेरे दोस्त तेरा इंतजार कर रहे थे, किश्ती में कितने खुश थे तू और गालिब, तू हाथ नीचे डालकर लहरों को थपकी दे रहा था,उठ अब हमें उनींदी हैरत और खुशी से पहचान, आ तेरे जूतों से रेत निकाल दूं, चल हमारा इंतजार कर रहा है अब इसी खाक का दामन। ज्ञातव्य है कि ‘आलैन’ स्थिर चित्र पूरी त्रासदी का वर्णन करता है।

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