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एन. रघुरामन का कॉलम:जब आपके पास खोने को कुछ नहीं होता और आप लड़ाई में अपना सर्वश्रेष्ठ देते हैं, तो जीत की संभावना हमेशा बहुत ज्यादा होती है

4 महीने पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

नवकेतन फिल्म्स के बैनर तले बनी ढेरों फिल्मों को देखें, तो फ्लॉप की संख्या व्यावसायिक रूप से सफल फिल्मों से कहीं ज्यादा है। इस आधार पर तो देव आनंद को फिल्में बनाना बहुत पहले बंद कर देना चाहिए था। उनमें खुद को और नए कलाकारों को फिल्मों में रखकर निर्माण लागत कम रखने की क्षमता थी, जो बॉलीवुड में विलक्षण है।

देव आनंद की एक आम फिल्म की लागत 2 करोड़ रुपए थी, जबकि औसत बॉलीवुड फिल्म पर करीब 15 करोड़ खर्च होते थे। बॉलीवुड कवर कर रहे मेरे कई साथी पत्रकारों से वे कहते थे, ‘जब तक मैं जिंदा हूं, फिल्में बनाता रहूंगा।’ तब उनका मशहूर कथन था, ‘मैं जब जून 1942 में ट्रेन से बॉम्बे के लिए निकला, तब मेरी जेब में 30 रुपए थे। मैं हीरो बनने के लिए दोस्तों के घर रुका, कम खाने पर जिंदा रहा। मेरा क्या नुकसान हो सकता है। मैं कभी भी 30 रुपए लेकर घर वापस जा सकता हूं..’

मुझे देव साहब के ये शब्द याद आए, जब अजिंक्य रहाणे के नेतृत्व में भारत ने बॉर्डर-गावसकर ट्रॉफी 2020-21 के अंतिम, चौथे टेस्ट मैच में ऑस्ट्रेलिया को तीन विकेट से हराकर सीरीज पर कब्जा किया और ऑस्ट्रेलिया के 32 साल लंबे जीत के सिलसिले को खत्म कर दिया। ऑस्ट्रेलिया 1988 से अब तक ब्रिस्बेन में नहीं हारी थी।

याद रखें कि हमारी क्रिकेट टीम पर टूटी हडि्डयों और चोटिल शरीरों का बोझ था, लेकिन उसने ट्रॉफी बरकरार रखने के लिए अनोखा उत्साह दिखाते हुए ऑस्ट्रेलिया पर जीत हासिल की। टीम ने सफलतापूर्वक 328 रनों के लक्ष्य का पीछा कर सीरीज 2-1 से जीती। सबसे बड़ी बात यह कि पेट में जीत की आग रखने वाले आक्रामक कप्तान विराट कोहली की गैर-मौजूदगी में टीम ने ऐसा किया, जो फिलहाल पितृत्व अवकाश पर हैं।

भारतीय टीम को इसका लाभ मिला कि टीम में नए खिलाड़ी थे, जिनके मन में कोई बंधन नहीं थे। तमिल में एक पुरानी कहावत है, ‘आप धागे से बांधकर पहाड़ खीचें। अगर सफल रहे तो आपकी जेब में पहाड़ होगा, और नहीं हुए तो सिर्फ धागे का नुकसान होगा।’ खासतौर पर यह चौथा टेस्ट बेफिक्री की मानसिकता से खेला गया था।

दूसरी तरफ, ऑस्ट्रेलिया ने अपना ट्रेडमार्क व्यवहार जारी रखा और स्लेजिंग, चीखकर गलत अपील और खेल भावना के विरुद्ध हाव-भाव का प्रदर्शन करते रहे क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके अलावा कोई नहीं जीत सकता। उन्होंने भारत को इतिहास बनाने दिया।

मैं अपनी सीट से हिला भी नहीं, जब पंत कट, ड्रोव और पैडल-स्वेप्ट शॉट मारते हुए आलोचकों को जवाब दे रहे थे और भारत को विदेश में शानदार जीत दिलाने के लिए अंतिम सेशन के आखिरी पलों में ऑफ-ड्राइव बाउंड्री मार रहे थे। हुनर के भंडार ऋषभ पंत (138 गेंद पर 89 रन नाबाद) ने अपने अंदर के ‘मैड मैक्स’ को जगाकर असाधारण खेल से ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को डरा दिया और ‘गाबा के किले’ पर 32 साल से कब्जा कर बैठी टीम को हरा दिया।

बेशक आखिरी दिन के प्रदर्शन की विशेष जगह है, लेकिन इस मैच की कहानी सबसे जूनियर शार्दुल ठाकुर और वॉशिंगटन सुंदर के उल्लेख के बिना अधूरी है, जिन्होंने तीसरी सुबह और दोपहर को शानदार साझेदारी की। इसके बिना भारत के लिए जीत इतनी आसान न होती। संक्षेप में ठाकुर और वॉशिंगटन ने लड़ाई की उम्मीद दी और पुजारा, गिल और पंत ने अपने प्रदर्शनों से उस लड़ाई का सम्मान किया।

फंडा यह है कि जब आपके पास खोने को कुछ नहीं होता और आप लड़ाई में अपना सर्वश्रेष्ठ देते हैं, तो जीत की संभावना हमेशा बहुत ज्यादा होती है।

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