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अनुपमा चोपड़ा का कॉलम:साउथ में कोरोना के बावजूद सैकड़ों फिल्में बन रहीं, हिंदी सिनेमा कहीं पीछे तो नहीं रह गया

4 महीने पहले
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अनुपमा चोपड़ा, संपादक, FilmCompanion.in - Dainik Bhaskar
अनुपमा चोपड़ा, संपादक, FilmCompanion.in

लॉकडाउन वगैरह के बाद से साउथ फिल्म इंडस्ट्री ने जो जोरदार वापसी की है, वह खुशियों से भरी है। राणा डग्गुबाती के मुताबिक, तेलुगू फिल्म इंडस्ट्री में लॉकडाउन के बाद से 312 फिल्में शुरू हुईं। ज्यादातर अलग-अलग चरणों पर पर हैं। 98 फिल्में शूट पर चली गई हैं। आलम यह है कि हैदराबाद में इन दिनों आप कैमरा और लाइटिंग वगैरह हायर नहीं कर सकते। इतना ज्यादा काम हो रहा है कि किसी के पास वक्त ही नहीं है।

साउथ की फिल्म ‘मास्टर’ 50 दिनों से सिनेमा में है। हालिया रिलीज ‘जथि रत्नालु’ ने 50 से 55 करोड़ का कलेक्शन कर लिया है। तेलुगू की ही एक और फिल्म है ‘पुष्पा’, इसमें अल्लू अर्जुन हीरो हैं। उनके अपोजिट विलेन मलयाली फिल्मों के बहुत बड़े नाम फहाद फाजिल हैं। फहाद ने तो कोरोना के दौरान फोन कैमरा की मदद से फिल्म बना ली थी। ये बिल्कुल रुकने वाले लोग नहीं है।

ऐसा लग रहा है कि हर दूसरे दिन कोई अनाउंसमेंट हो रहा है। वहां सब लोग ऐसे जोर-शोर से लग गए हैं कि लगता है कि हिंदी सिनेमा कहीं पीछे तो नहीं रह गया! इस तादाद में शायद हिंदी में फिल्में नहीं बन रही हैं। मैंने राणा डग्गुबाती से पूछा कि साउथ में इतनी फिल्में कैसे बन पा रही हैं? उनका जवाब था कि बड़े सितारों और स्टूडियोज के बीच जमकर करार हो रहे हैं। महामारी से लेकर अब तक साउथ की चारों इंडस्ट्रीज ने कमबैक किया है।

अलबत्ता यहां दो सवाल उठते हैं। पहला तो यह कि क्या साउथ के सिनेमाघरों में ऑडिएंस आ रही है? जवाब हां हैं। बॉक्स ऑफिस इंडिया के एडिटर ने कहा था कि दर्शकों की सिनेमाघरों में संख्या अच्छी है। हां, हिंदी फिल्मों की बात करें तो वहां अभी यंग ऑडिएंस आ रही है। फैमिली ऑडिएंस का आना बाकी है।

हिंदी की बात करें तो ‘रूही’ देखने तो लोग आए, तभी बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 20 करोड़ के पार है। ‘मुंबई सागा’ का कलेक्शन शायद इसलिए भी कम रहा कि कोरोना काल ने लोगों के टेस्ट को बदला है। मुंबई सागा की फील ‘शूटआउट एट वडाला’ जैसे ही थी, जिसे लोग पहले ही देख चुके हैं। वरना कलेक्शन ठीक रहता। अब उम्मीदें ‘सूर्यवंशी’ और ‘राधे’ जैसी फिल्मों से है।

रहा सवाल नॉर्थ की आडिएंस का, तो सिनेमा आकर ही फिल्में देखने का श्रद्धा भाव साउथ के मुकाबले जरा अलग है। यह जवाब भी मुझे राणा से मिला। वह यह कि वहां के फिल्म निर्माता और सिनेमाघर मालिक ऑडिएंस का ख्याल रखते हैं। टिकट कीमतों की एक सीमा यानी कैप है। वहां यह विजन नहीं होता कि मेगा बजट फिल्में आ रहीं हैं, तो टिकट कीमतें बढ़ा दें, बल्कि कीमतें कम रखी जाएं, ताकि हर फ्राइडे ऑडिएंस आती रहे। हर फिल्म को फायदा हो। ताकि दूरगामी सकारात्मक प्रभाव पूरे मनोरंजन उद्योग को हो। किसी भी फिल्म को वीकेंड कलेक्शन पर ही निर्भर न होना पड़े, जैसा यहां हिंदी फिल्मों के साथ रहता है।

इससे वहां हर फिल्म को देखने ऑडिएंस अक्सर हर शुक्रवार आती ही है। किसी भी फिल्म का ओपनिंग का गेम नहीं है। ऐसे में पूरे साल वहां के सिनेमा दर्शकों से गुलजार रहते हैं। वहां की प्रोड्यूसर्स बॉडी भी बहुत स्ट्रॉन्ग हैं। सिनेमाघरों में टिकटों पर लिमिट की कैप तो है ही, वहां फिल्मों के प्रमोशन पर भी एक कैप है कि बड़ी से बड़ी फिल्में भी एक लिमिटेड अमाउंट में ही पैसे खर्च कर सकती हैं। यह नहीं कि जिनके पास काफी पैसा है, वो प्रमोशन में पानी की तरह पैसा बहाएं। और जिनके पास पैसा नहीं है, वो फिल्में प्रमोट ही न कर सकें।

ऐसे में सभी फिल्मों को लोकतांत्रिक तरीके से अपनी फिल्में प्रदर्शित करने के मौके मिल जाते हैं। सरल शब्दों में कहा जाए तो लॉन्ग रन में फिल्म इंडस्ट्री के लिए क्या बेहतर है, वह किया जाए। तभी वहां इस दौर में भी थोक के भाव में फिल्में बन रहीं हैं। नजरिया यह है कि हर किसी की फिल्म चले। तभी कलेक्शन और प्रॉफिट का पैसा घूमकर फिल्म इंडस्ट्री में ही आए।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)