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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:हमारी जहालत सदियों पुरानी है और मौजूदा व्यवस्था ने उसे सुगठित मात्र किया है

8 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

एक महिला के साथ अभद्र व्यवहार का आरोप घटना के वर्षों बाद लगाया गया। महिला की गरिमा की रक्षा का नियम 2013 में बना था। अत: आरोप भी उसके बाद ही लगाया गया। मामला एक भूतपूर्व मंत्री से जुड़ा था। भूत पूर्व मंत्री ने ही फटे में अपना पैर डाला और परिणाम भी सामने है। इस प्रकरण का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि महिला ने किसी मुआवजे की मांग नहीं की। वह गरिमा मात्र की रक्षा की बात कह रही है।

इस अभूतपूर्व फैसले में यह बात भी रेखांकित हुई है कि घटना के लंबे समय बाद भी न्याय के लिए प्रार्थना की जा सकती है। एक महिला गवाह पर दबाव बनाया गया परंतु वह टस से मस नहीं हुई। ज्ञातव्य है कि रानी मुखर्जी अभिनीत फिल्म ‘नो वन किल्ड जेसिका’ में भी इसी तरह का मुकदमा प्रस्तुत हुआ था। वह प्रकरण हत्या का था। इससे कुछ हद तक मिलती काल्पनिक फिल्म थी ‘पिंक’ जिसमें अमिताभ बच्चन ने वकील की यादगार भूमिका अभिनीत की थी।

इस फिल्म का संबंध भी एक बिगड़ैल मंत्री पुत्र से था। फिल्म ‘पिंक’ में जज का नाम था सत्यजीत दत्त। इस तरह शूजित अपने महान फिल्मकार सत्यजीत रॉय को आदर्श भी अर्पण कर रहे थे। मानो अपने काम के लिए प्रमाण पत्र अपने प्रेरणा पुरुष से मांग रहे हों। व्यक्तिगत प्रतिभा अपनी महान परंपरा से प्रेरणा लेकर काम द्वारा उसी परंपरा को मजबूत करती हुई चलती है।

ऋषि कपूर और तापसी पन्नू अभिनीत ‘मुल्क’ में भी जज टिप्पणी करते हैं कि बस इसका ख्याल रखें कि किसी राजनैतिक महान भवन में दकियानूसी रीति रिवाज ना पहुंच पाएं। हाल ही में एक ऐसे नए भवन का निर्माण कार्य दकियानूसी के साथ हुआ। कुछ फिल्में सामाजिक दस्तावेज की तरह बन जाती है।

लोकप्रिय अमेरिकन फिल्म ‘इनडीसेंट प्रपोज़ल’ में महंगाई-बेरोजगारी के समय एक हताश व्यक्ति जुआ घर में अपनी पत्नी को हार जाता है। उसकी पत्नी को दो दिन और एक रात विजेता के साथ गुजारनी है। पत्नी के लौटने के बाद पति सामान्य नहीं रह पाता। पूरे विश्व में ही महिला को जूूठा बर्तन समझे जाने की नादानी होती है। फिल्म के क्लाइमेक्स में स्पष्ट होता है कि उस अभद्र प्रस्ताव में कोई अभद्रता नहीं हुई थी।

अमीर व्यक्ति महज इम्तिहान ले रहा था और मध्यम आय वर्ग की बेरोजगारी व महंगाई की मारी लाचार स्त्री की चारित्रिक शक्ति से चौंधिया गया था। पत्नी को जुए में हार जाना सदियों से हो रहा है। महाभारत तो प्राचीन ग्रंथ है परंतु थॉमस हार्डी के उपन्यास ‘द मेयर ऑफ कास्टरब्रिज’ में भी इस तरह की घटना का विवरण प्रस्तुत किया गया था। जिससे प्रेरित होकर यश चोपड़ा ने राजेश खन्ना, शर्मिला टैगोर और राखी अभिनीत ‘दाग’ नामक फिल्म बनाई थी।

सुभाष कपूर की फिल्म ‘फंस गए रे ओबामा’ भी ‘जॉली एलएलबी 2’ की तरह यादगार फिल्म मानी जाती है। महंगाई और अब बेरोजगारी अपराध को जन्म दे रही है। पेट्रोल के दाम दिन प्रतिदिन बढ़ाए जाने का दोष भूतपूर्व व्यवस्था को दिया जा रहा है। अपनी कमतरी का दोष प्राय: विगत सदी को दिया जाने वाला खेल ना जाने कब से जारी है। हमारी जहालत सदियों पुरानी है और मौजूदा व्यवस्था ने उसे सुगठित मात्र किया है।

लिओन यूरिस के उपन्यास ‘क्यू बी 7’ में एक भूतपूर्व नाजी पर मुकदमा कायम है कि हिटलर के दौर में उसने यहूदियों के अंग निकाले। जज का फैसला है कि यथेष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है। अतः भूतपूर्व नाजी निर्दोष है और मानहानि के एवज में चार पैसे उसे दिए जाएं। उसकी गरिमा का मूल्य में चार पैसे दिया जाना उस नाजी की सजा जैसा है। महिला के साथ अभद्रता का यह अदालती फैसला एक अपवाद है। विगत समय में जो हो रहा था उस पर कुमार अंबुज की कविता है- ‘न्याय की देवी अंधी, राजनीति ने उसकी आंखें खोल दी हैं।’ फरियादी न्याय मांगता है तो वकील कहता है कि यह तो न्यायालय की अवमानना है। न्याय अब मुमकिन नहीं, मुआवजे के लिए आवेदन कर सकते हैं। ताजा प्रकरण में महिला ने मुआवजा ही नहीं मांगा।

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