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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री इन चारों की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है

10 दिन पहले
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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar
पं. विजयशंकर मेहता

दुख को आदत बना लो तो धीरे-धीरे वह भी मजा देने लगता है। दुख कभी किसी के समाप्त होंगे भी नहीं। फिर भी इंसान है कि सुख की चाहत में बावला हुआ जा रहा है। कइयों का तो एक ही लक्ष्य होता है किसी भी तरह सुख ढूंढ लें। इतनी तीव्रता से सुख पाने की कोशिश करते हैं कि दुख को धक्का देने लगते हैं। पर, सुख और दुख दोनों जानते हैं कि हम एक-दूसरे के बिना न तो आएंगे, न जाएंगे।

ये दोनों साथ ही चलते हैं। तो फिर क्या किया जाए? हमारी उमंगें सुख की तलाश में बावली और दुख आने पर उदास हो जाती हैं। इस कोरोना ने ऐसा माहौल निर्मित कर दिया है कि यह एक प्रकार से से आपात काल का दौर है। तो विपत्ति के समय इस पंक्ति को याद रखिए- ‘धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी।’ धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री इन चारों की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है। चूंकि यह विपत्ति का काल है, अपने धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री को परखते रहो।

इन चारों का ठीक से उपयोग करें तो दुख में से भी सुख निकल आएगा। यहां धैर्य का अर्थ है अनुशासित जीवनशैली, धर्म का मतलब है आप जो काम, नौकरी-धंधा करते हों उसे पूरी ईमानदारी से करें, मित्र का अर्थ है एक-दूसरे के काम आएं-सेवा का भाव रखें और स्त्री का मतलब है अपने घर की महिलाओं को अतिरिक्त सम्मान दें।