पवन के. वर्मा का कॉलम:चमचागीरी के साथ खास बात यह है कि यह छुप-छुपाकर नहीं, खुलकर की जाती है

11 दिन पहले
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पवन के. वर्मा, लेखक, राजनयिक, पूर्व राज्यसभा सांसद - Dainik Bhaskar
पवन के. वर्मा, लेखक, राजनयिक, पूर्व राज्यसभा सांसद

एक समय था, जब नौकरशाह अपने राजनीतिक आकाओं को निष्पक्ष राय देते थे और उन्हें बताते थे कि सही कदम कौन-सा होगा। वरिष्ठ राजनेता भी इसके लिए उनकी सराहना करते थे, भले उन्हें उनकी सलाह पसंद न आए। लेकिन आज खुशामद का माहौल है, जिसमें नौकरशाह ड्यूटी के बजाय वफादारी करने के बारे में अधिक सोचते हैं। वे ‘यस मैन’ बन गए हैं और स्वामी-वर्ग का अनुमोदन पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं।

कहना कठिन है कि इसके लिए किसे अधिक दोष दिया जाए- राजनेताओं को या नौकरशाहों को। उस तरह के राजनेता अब दुर्लभ होते जा रहे हैं, जो अधिकारियों की निष्ठा और साहस के लिए उनका सम्मान करते थे। वहीं वैसे अधिकारियों की संख्या बढ़ रही है, जिन्हें अगर झुकने को कहा जाए तो वे घुटनों के बल बैठ जाते हैं। इससे ऐसी संस्कृति निर्मित हो गई है, जिसमें नेता व अधिकारी दोनों एक-दूसरे से खुश रहते हैं- एक को जी-हुजूरी मिलती है, दूसरे को इसका इनाम, जैसे मालदार पोस्टिंग या सफल कॅरियर।

सिद्धांतों से समझौता करके सत्ता को समर्थन देने की वृत्ति ने चाटुकारिता को एक कला बना दिया है। यही कारण है कि चमचा और मस्का जैसे शब्द पूरे भारत में समझे जाते हैं। जो सत्ता के निकट रहकर उससे अधिक से अधिक लाभ पाना चाहते हैं, उन्हें इसके लिए अनेक प्रतिस्पर्धियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए वे सही समय पर, सही बात को, सही तरीके से कहने की प्रतिभा विकसित कर लेते हैं। चमचे और उसके स्वामी की देहभाषा अब एक व्यवहार-संहिता बन गई है।

यह इससे तय होती है कि किसी हायरेर्की में व्यक्तियों का क्या ओहदा है। चमचागीरी के साथ उल्लेखनीय बात यह है कि यह छुप-छुपाकर नहीं, खुलेआम व अतिरेक के साथ की जाती है। इससे स्वामी को शर्मिंदगी का अहसास नहीं होता, न ही खुशामदी को संकोच होता है। वे इसे जरूरी बताकर न्यायोचित ठहराते हैं, क्योंकि प्रशंसा तो प्रभु को भी प्रिय है। तुलसीदास ने बहुत सटीक तरीके से इसे कहा है- समरथ को नहिं दोष गुसाईं, रवि पावक सुरसरि की नाईं, यानी जो सामर्थ्यवान है, उसका कोई दोष नहीं हो सकता, वह सूर्य, अग्नि, गंगा की तरह पवित्र है।

जरा किसी मंत्री के सामने नौकरशाह या प्राइवेट सेक्टर में बॉस के सामने सीनियर एग्जीक्यूटिव का व्यवहार देखिए, या जीवन में ऐसे लोगों को देखिए जो किसी सुपीरियर-सबऑर्डिनेट सम्बंध में हैं। पता चल जाएगा कि समरथ को नहीं दोष वाली बात कितनी सच है। बचपन में मैंने एक कहानी सुनी थी। एक बादशाह बैंगन खा-खाकर उकता गया था। एक दिन उसने वजीर से कहा कि बैंगन बेकार चीज है। वजीर ने हां में हां मिलाते हुए बैंगन की बुराई शुरू कर दी। कुछ दिन बाद राजवैद्य बादशाह से मिले और बैंगन के लाभकारी गुणों के बारे में बताया।

जब बादशाह ने अपने वजीर को भी यह बात बताई तो वे बैंगन की तारीफों के पुल बांधने लगे। बादशाह को याद आया कि वजीर ने इससे पहले बैंगन को बहुत भला-बुरा कहा था। नाराज होकर उन्होंने वजीर से कहा कि तुम एक-दूसरे से पूरी तरह से अलग दो बातें कैसे बोल सकते हो? वजीर ने कहा, हुजूर, मैं आपकी नौकरी करता हूं, बैंगन की नहीं। उस वजीर के व्यवहार में जो लचीलापन था, वह इस धारणा पर आधारित था कि उसकी निजी राय का उतना महत्व नहीं है, जितना कि वह जिस पद पर है, उसके रुतबे का है।

यही वह रवैया है, जिसके चलते हम ताकतवर के सामने झुक जाते हैं- एक बार हमें पता भर चल जाए कि सत्ता कहां है, वह किस तरह से स्वयं को प्रदर्शित करती है और उससे हमें क्या लाभ हैं। ये शर्तें पूरी हों तो निजी हित की वेदी पर सिद्धांतों का बलिदान बड़ी आसानी से दिया जा सकता है। लेकिन लोकतंत्र में ‘यस मैन’ की संस्कृति चिंताजनक है। इससे सत्ता निरंकुश हो जाती है और अंतत: खामियाजा नागरिक को भुगतना पड़ता है। नैतिक मानदंडों की स्थापना के लिए राजनेताओं को पहल करना होगी, पर वो तो ऐसा करने से रहे।

एक लोकतंत्र में ‘यस मैन’ की संस्कृति बहुत चिंताजनक बात है। इससे सत्ता निरंकुश हो जाती है और गलत फैसले लेने लगती है। अंतत: इसका खामियाजा भी आम नागरिक को ही भुगतना पड़ता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)