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पवन के. वर्मा का कॉलम:जीवन के प्रति संतुलित रुख अपनाती है हमारी संस्कृति

6 दिन पहले
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पवन के. वर्मा,  लेखक, राजनयिक, पूर्व राज्यसभा सांसद - Dainik Bhaskar
पवन के. वर्मा, लेखक, राजनयिक, पूर्व राज्यसभा सांसद

अभिनेता रणवीर सिंह ने एक मैगजीन के लिए हाल ही में बोल्ड फोटोशूट कराया, जिसके बाद उनके विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराने का सिलसिला शुरू हो गया। मुम्बई में एक एनजीओ चलाने वाले ललित टेकचंदानी ने यह कहते हुए रिपोर्ट दर्ज कराई कि उनकी तस्वीरें महिलाओं की भावनाओं को आहत करती हैं। उन्होंने रिपोर्ट में यह भी लिखा कि ऐसी तस्वीरें भारतीय संस्कृति को ठेस पहुंचाती हैं।

मुम्बई की एक अन्य वकील वेदिका चौबे ने भी ऐसी ही एफआईआर दर्ज कराई। ऐसे में यह पूछना वाजिब होगा कि क्या हम वास्तव में ही इतने पाखंडी हैं? हमारी संस्कृति दुनिया की सबसे अधिक व्यावहारिक और संतुलित संस्कृतियों में से एक है। हमारे यहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को चार पुरुषार्थ माना गया है।

ये पुरुषार्थ जीवन के प्रति एक संतुलित दृष्टिकोण को सामने रखते हैं, जिसमें चीजों का बहिष्कार नहीं बल्कि समावेश किया जाता है, ताकि व्यक्ति एक सम्पूर्ण जीवन जीकर प्रसन्नता और संतोष को अर्जित कर सके। चूंकि चार पुरुषार्थों में काम को भी सम्मिलित किया गया है, इसलिए इसका यही अर्थ निकलता है कि हम ऐंद्रिकता के लिए प्रतिकूल रवैया नहीं रखते।

यूनानी देवता इरोज़ और रोमन देवता क्यूपिड की तरह हमारे यहां कामदेव को प्रेम का देवता माना गया है। अथर्ववेद में उनकी महिमा स्रष्टा और सर्वोच्च देवता के रूप में गाई गई है। ऋग्वेद में उन्हें देवताओं के द्वारा अतुल्य बताया गया है। तैत्तिरीय ब्राह्मण के अनुसार काम धर्म और श्रद्धा का पुत्र है। जहां धर्म न्याय के देवता हैं, वहीं श्रद्धा विश्वास की देवी हैं।

काम को चार पुरुषार्थों में जगह देकर हमने प्रेम, आकांक्षा, ऐंद्रिकता की भावनाओं को मान्यता भी दी है। यही कारण है कि हमारे मिथकों में देवताओं को ब्रह्मचारी या वैरागी के रूप में वर्णित नहीं किया जाता है और उनकी संगिनियां रूपसी दर्शाई जाती हैं। हमारी कला में भी इसी कारण प्रखर ऐंद्रिकता है। महाकवि कालिदास की कृतियों को ही ले लें। या फिर बिल्हण, जयदेव की रचनाओं को देख लें, जिनमें प्रणय का उन्मुक्त चित्रण है।

हमारे उपासनागृहों में भी ऐंद्रिकता और आध्यात्मिकता को एक-दूसरे से सम्बद्ध प्रदर्शित किया गया है, जिनमें खजुराहो और कोणार्क सबसे प्रसिद्ध हैं। उपासनागृहों की दीवारों पर प्रणय-प्रतिमाओं को उत्कीर्ण करने का अर्थ यही था कि आकांक्षाओं को हमारे यहां दिव्यता के व्यापक परिसर का एक हिस्सा माना जाता है, अलबत्ता यह निरंकुश व्यभिचार का अनुमोदन नहीं था।

कामसूत्र में वात्स्यायन ने कहा था कि अगर धर्म, अर्थ और काम को सही अनुपात में अंगीकार किया जाए तो हम स्वत: चौथे लक्ष्य यानी मोक्ष तक पहुंच जाएंगे। यह विडम्बना ही है कि इस्लामिक रूढ़िवाद और औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश विक्टोरियन नैतिकता के प्रभाव में आकर हमारे यहां भी मोरल पुलिसिंग की वृत्ति बलवती हो गई है।

हम अपनी परम्परा को ही भूल गए हैं, जिसमें आकांक्षाओं के उत्साहपूर्ण किंतु संयमित निर्वाह का उत्सव मनाया जाता था। आज हमारे यहां संस्कृति के नाम पर युवा जोड़ों को बाग-बगीचों में सताया जाता है, जबकि हम जानते तक नहीं कि हमारी वह संस्कृति अतीत में कैसी रही है। महिलाओं को भावनाहीन वस्तुओं की तरह देखना भी इसी का एक लक्षण है, जिसके कारण हम यह सोचने लग जाते हैं कि अगर रणवीर सिंह अपने शरीर का प्रदर्शन करते हैं, तो इससे स्त्रियों की शुचिता की रक्षा करने का दायित्व भी हमारा ही है!

(ये लेखक के अपने विचार हैं)