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पीटर कॉय का कॉलम:एलन मस्क ने टेस्ला के साथ आसमान की ऊंचाइयां छू ली थीं, लेकिन ट्विटर के साथ वे तेजी से नीचे गिरने जा रहे हैं!

24 दिन पहले
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पीटर कॉय इकोनॉमिक्स के विशेषज्ञ और द न्यूयॉर्क टाइम्स, बिजनेस वीक, ब्लूमबर्ग के स्तम्भकार - Dainik Bhaskar
पीटर कॉय इकोनॉमिक्स के विशेषज्ञ और द न्यूयॉर्क टाइम्स, बिजनेस वीक, ब्लूमबर्ग के स्तम्भकार

जो चीफ एग्जीक्यूटिव तानाशाही किस्म का मिजाज रखते हैं और चीजों की नकेल कसना पसंद करते हैं, वे हमेशा सुर्खियों में रहते हैं और चर्चा-बहस का विषय बने रहते हैं। साधारण एग्जीक्यूटिव्स को जो विवशताएं और मर्यादाएं बांधे रखती हैं, उनसे वे पूर्णतया मुक्त होते हैं।

जब वे ऊपर जाते हैं तो बहुत ऊंचे चले जाते हैं और जब नीचे गिरते हैं तो बहुत गहराई नाप आते हैं। आज हम बात कर रहे हैं दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति एलन मस्क की, जिन्होंने टेस्ला के साथ आसमान की ऊंचाइयां छू ली थीं, लेकिन अब ट्विटर के साथ वे उतनी ही तेजी से नीचे गिरने जा रहे हैं!

एक सर्वसत्तावादी सीईओ के दिमाग में आखिर क्या चल रहा होता है, इसको और अच्छे से समझने के लिए पिछले सप्ताह मैंने सिलिकॉन वैली में स्थित लेखक, अध्येता और उद्यमी विवेक वाधवा से बात की। वर्ष 2016 में वाधवा ने क्वार्ट्ज के लिए एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था- दुनिया की बेहतरीन कंपनियां, जिनकी कमान बुद्धिमान तानाशाहों के हाथ में है।

मुझसे चर्चा में उन्होंने कहा कि जब आप विज़नरी होते हैं तो आपके दिमाग में बड़े-बड़े आइडियाज़ आते हैं। आपको लगता है कि ये विचार दुनिया को बदल सकते हैं, लेकिन कोई भी आपकी बात मानने को तैयार नहीं है। वैसे में इन विज़नरी लोगों को सामान्य तर्क को उलटना होता है।

चीजों की नकेल कसकर रखना उनकी मजबूरी बन जाती है और वे चाहे-अनचाहे एक करिश्माई शख्सियत में तब्दील हो जाते हैं। लोगों को अपनी चुनी गई दिशा में अग्रसर कराने के लिए उन्हें सख्त होना पड़ता है, साथ ही उन्हें सबको साथ लेकर चलने की कला भी विकसित करनी पड़ती है।

इस तरह के नेताओं के लिए उनका काम ऑब्सेशन की तरह होता है और विफलता को वो एक विकल्प नहीं समझते। जब मस्क टेस्ला का एक नया मॉडल आम्बिएन लॉन्च कर रहे थे, तब उन्होंने सप्ताह में 120 घंटों तक काम किया था। एपल के को-फाउंडर स्टीव जॉब्स ने एक गूगल एग्जीक्यूटिव को रविवार के दिन बुला लिया था।

गूगल के लोगो में जो येलो ओ है, वे उसकी कलर-ब्लेंडिंग के बारे में आईफोन के संदर्भ में बात करना चाहते थे। वॉल्ट डिज्नी ने स्नो व्हाइट और सेवेन ड्वार्फ्स नामक एनिमेटेड फिल्म के लिए अपनी सारी जमा-पूंजी दांव पर लगा दी थी और लगभग दिवालिया हो गए थे।

जब इस तरह के ऑटोक्रेट लोग किसी स्टार्टअप में काम कर रहे होते हैं, तब उनका यह जज्बा कारगर साबित होता है। क्योंकि वे आखिरी समय तक कामयाबी के लिए किला लड़ाना जानते हैं। लेकिन जब कम्पनी बड़ी हो जाती है तो उनकी यही आदतें काम में रूकावटें डालने लगती हैं। क्योंकि किसी स्टार्टअप को चलाने और एक स्थापित कम्पनी काे मैनेज करने में जमीन-आसमान का अंतर होता है।

जो एक के लिए सही है, वह दूसरे के लिए ठीक नहीं हो सकता। एक बड़ी कम्पनी चलाने के लिए परिपक्वता, शांतिपूर्ण रवैया, सुनने की आदत, सर्वसम्मति का निर्माण आदि जरूरी हैं। यहीं पर आकर मस्क एक मुसीबत बन जाते हैं। उन्हें लगता है कि जो टेस्ला के लिए कारगर था, वही ट्विटर में भी नतीजे देगा। जबकि ऐसा नहीं है क्योंकि अब वे अपने डोमेन के बाहर काम कर रहे हैं। अगर वो इसी तरह से चलते रहे तो ट्विटर उनका वॉटरलू साबित हो सकता है।

जब ऑटोक्रेटिक रवैया रखने वाले सीईओ के दिमाग पर सफलता का भूत चढ़ जाता है तो यह उनके लिए ठीक नहीं होता। सफलता के साथ समस्या यह है कि यह बहुत हाईप क्रिएट करती है। आपके आसपास के लोग आपको ईश्वर की तरह देखने लगते हैं और आप जाने-अनजाने उन पर यकीन करने लग जाते हैं। इसी से गॉड-कॉम्प्लेक्स का निर्माण होता है।

मार्क जकरबर्ग की अवस्था मस्क जैसी तो नहीं है, लेकिन वे भी अपने वॉटरलू का ही सामना कर रहे हैं। मेटा- जो पहले फेसबुक कहलाता था- के शेयर्स इस साल दो-तिहाई गिरे हैं और निवेशकों ने वर्चुअल रियलिटी के उनके महंगे ख्वाब में भरोसा नहीं जताया है।

मेटा का ड्यूल-क्लास शेयर स्ट्रक्चर जकरबर्ग के हाथ में कम्पनी का पूरा नियंत्रण सौंप देता है। वे भी मस्क की ही तरह सर्वसत्तावादी हैं। एक बार हिलेरी क्लिंटन ने द अटलांटिक से चर्चा में कहा था कि फेसबुक के शीर्ष पर बैठे लोगों से बात करते समय लगता है, जैसे हम किसी विदेशी सत्ता से संवाद कर रहे हों।

अलबत्ता दूसरे कॉर्पोरेट ऑटोक्रेट्स के साथ चीजें इतनी बदतर नहीं हैं। मिसाल के तौर पर, अमेजन के जेफ बेजोस, जिन्होंने कम्पनी के रोजमर्रा के कामों से समय रहते ही खुद को दूर कर लिया था। वैसे यह एक अतिशयोक्तिपूर्ण तुलना मालूम हो सकती है, लेकिन कभी-कभी लगता है कि यूक्रेन में जो हालत पुतिन की हुई है, ट्विटर में वही मस्क की हो रही है।

ठीक है, मस्क ने किसी देश पर धावा नहीं बोला है, एक सोशल मीडिया कम्पनी ही खरीदी है। लेकिन दोनों में समानता यह है कि उनका ओवर-कॉन्फिडेंस कई बार उन्हें मुश्किल में डाल देता है। और यह ओवर-कॉन्फिडेंस आता कहां से है? उसी गॉड कॉम्प्लेक्स से, जिसके बारे में हम ऊपर बात कर चुके हैं। (द न्यूयॉर्क टाइम्स से)

स्टार्टअप और कम्पनी में भेद है
किसी स्टार्टअप को चलाने और एक स्थापित कम्पनी काे मैनेज करने में जमीन-आसमान का अंतर है। जो एक के लिए सही है, वह दूसरे के लिए ठीक नहीं हो सकता। एक बड़ी कम्पनी चलाने के लिए परिपक्वता, शांतिपूर्ण रवैया, सुनने की आदत, सर्वसम्मति का निर्माण आदि जरूरी हैं। यहीं पर मस्क भूल कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि जो टेस्ला के लिए कारगर था, वह ट्विटर में भी नतीजे देगा।