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प्रवीण नाहर का कॉलम:डिजाइन थिंकिंग से बदल सकता है समस्याएं देखने का नजरिया

12 दिन पहले
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प्रवीण नाहर, निदेशक, एनआईडी, अहमदाबाद - Dainik Bhaskar
प्रवीण नाहर, निदेशक, एनआईडी, अहमदाबाद

सीखने का क्रम जिंदगी भर चलता है। सीखने का एक बड़ा हिस्सा आसपास की चीजों को देखने, समझने व सोखने का होता है। डिजाइन भी एक तरह से मौजूदा समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्योंकि किसी भी चीज के निर्माण का डीएनए दरअसल डिजाइन ही है। वो हमें उन्हीं समस्याओं को अलग ढंग से देखने, उनके समाधान निकालने के टूल देता है।

जटिल से जटिल समस्याओं को छोटे-छोटे सरल हिस्सों में तोड़कर समझना डिजाइन थिंकिंग का ही हिस्सा है। डिजाइन एजुकेशन, सीखने वालों को हकीकत से जोड़ती है और उन्हें समाधान पर काम करने का नॉलेज व तजुर्बा देती है। हालांकि आज भी ज्यादातर लोग डिजाइन को सिर्फ सौन्दर्य शिल्प ही मानते हैं जबकि डिजाइन थिंकिंग एक सोशल टेक्नोलॉजी है जिसमें प्रैक्टिकल टूल्स के साथ-साथ इंसान के व्यवहार को समझना जरूरी है।

सबसे अच्छी बात है कि आज हम ऐसे देशों में शामिल हैं जो विकल्पों के धनी माने जाते हैं। नए आइडिया और नवाचार को आंत्रप्रेन्योरशिप तक ले जाने के रास्ते खुल रहे हैं। चुनौतियों और मुश्किलों के रचनात्मक समाधान तभी संभव हैं जब हम उन चीजों को भी सवालों के दायरे में लाएं जिनके बारे में हम सोचते हैं कि हम उनके बारे में जानते हैं। जिस दिमाग में इनोवेटिव आइडिया के बीज प्रस्फुटित होते हैं, वे जोखिम लेने वाले और हार से सीखकर आगे बढ़ने वाले दिमाग होते हैं।

जैसे एनआईडी की बाला महाजन और एन. पंडित ने केंचुए के बायो डाइजेस्टर सिस्टम के साथ टाइगर टॉयलेट डिजाइन किए जो ग्रामीण इलाकों के संसाधनों के अनुकूल टिकाऊ समाधान हैं। अपनी जिंदगी से जुड़े खेलों को ही लें। खिलौनों से लेकर गेमिंग इंडस्ट्री कितनी तेजी से बदल रही है। खेल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहे बल्कि शिक्षा, डिजाइन थिंकिंग, टेक्नोलॉजी, हेल्थ केयर और क्राफ्ट जैसे सेक्टर में जगह बना रहे हैं।

डिजिटल से लेकर बोर्ड गेम, खिलौने, प्ले स्पेस, स्पोर्ट्स इक्विपमेंट, एक्टिविटी किट्स और खेल के साथ इंटरेक्टिव एक्सपीरियंस में डिजाइन के जरिए कई नवाचार संभव हो सके हैं। आज से पहले क्या आप क्रिटिकल केयर से जुड़े मेडिकल डिवाइस में डिजाइन की ताकत की कल्पना कर सकते थे? शायद नहीं क्योंकि यह सेक्टर आयात पर आश्रित रहा है। लेकिन वास्तविकता यह है कि ईसीजी मशीनों से लेकर फिजियोथेरेपी में काम आने वाली मशीनों में डिजाइन व इनोवेशन बहुत अहम हैं। डि​​​​​​

​जाइन थिंकर सतीश गोखले ने दुनिया की पहली पूरी तरह से मोटराइज मोबाइल कैथ लैब और दमे के मरीजों के लिए 60 डोज ड्राय पाउडर इन्हेलर बनाया। नितिन सिसोदिया ने यूएस व यूके में प्रचलित एबीआर तकनीक का इनोवेटिव इस्तेमाल करते हुए बच्चों की सुनने की क्षमता जांचने के लिए सोहम डिवाइस डिजाइन किया। हमारी ही एक स्टूडेंट शेफाली बोहरा ने अपनी सहपाठी के साथ मिलकर एक ऐसी मेडिकल डिवाइस (डॉटप्लॉट) डिजाइन की, जिसकी मदद से कोई भी महिला आसानी से ब्रेस्ट कैंसर का पता लगा सकती है।

कंपनियां ऐसे यंग टैलेंट की तलाश में रहती हैं जो उनकी रफ्तार से दौड़ सकें। इसलिए जरूरी है कि स्टूडेंट्स खुद को अपडेट रखें, इंडस्ट्री की जरूरतों के अनुरूप खुद को अपस्किल करें। आप सिर्फ शैक्षणिक संस्थानों द्वारा तय इंटर्नशिप न करेंं। ज्यादा से ज्यादा इंटर्नशिप करें। खुद देखें कि चीजें वास्तविकता में कैसे काम करती हैं। संभव हो तो अपने आइडिया के दम पर आंत्रप्रेन्योर बनकर देखें।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)