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रीतिका खेड़ा का कॉलम:प्राथमिक स्कूल आवश्यक सेवा हैं, इन्हें सबसे पहले खोलना जरूरी, छोटे बच्चों की शिक्षा न हो नजरअंदाज

10 महीने पहले
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रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं - Dainik Bhaskar
रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं

कोरोना की वजह से मार्च 2019 में लॉकडाउन किया गया, तब से लगभग पूरे देश में, लगभग पूरे समय प्राथमिक स्कूल बंद हैं, हालांकि प्राथमिक स्कूल को ‘आवश्यक सेवाओं’ (एसेंशियल सर्विस) की श्रेणी में आना चाहिए। भारत में स्कूल-बंदी का दूसरा साल शुरू हो रहा है। जिन राज्यों में स्कूल खोले जा रहे हैं, वहां ज्यादातर 9-12 कक्षाओं पर ज़ोर दिया जा रहा है। प्राथमिक स्कूल पर ढिलाई अभी भी जारी है।

हमारे समाज में शिक्षा को कई बार केवल नौकरी के नजरिए से देखते हैं। शिक्षा एक जरिया तो है ही, लेकिन साथ-साथ, उसका खुद में भी मूल्य है। यदि आप धनी व्यक्ति हैं, लेकिन पढ़-लिख नहीं सकते तो आपकी जिंदगी में एक खोखलापन रहेगा। चूंकि नीति निर्माताओं में भी यह सोच है (कि शिक्षा का सबसे ज्यादा महत्व नौकरी-कमाई के लिए है) इस वजह से भी बड़ी कक्षाओं को खोलने पर जोर दिया जा रहा है, क्योंकि वहां से एडमिशन, पढ़ाई और नौकरी का रास्ता गुजरता है।

वास्तव में, बच्चे की शिक्षा में बचपन के वर्ष बहुमूल्य होते हैं, क्योंकि उनके जीवन की नींव इन वर्षों में डलती है। जब बच्चे वर्णमाला या नंबर-गिनती सीख रहे होते हैं तब टीचर द्वारा दिए गए क्लासरूम शिक्षण की अलग अहमियत होती है। जब बच्चे इतना सीख लें, तब खुद से पढ़ने की क्षमता बढ़ जाती है। कुछ लोगों का मानना है कि ऑनलाइन शिक्षा तो चल ही रही है, तो फिक्र कैसी? एक यह भ्रम है कि केवल गांवों के बच्चों को तकलीफ हो रही है। लेकिन आंकड़े कुछ और कहानी बताते हैं।

2017-18 में हुए नेशनल सैंपल सर्वे में ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 17% और शहरी क्षेत्रों में 44% लोगों के पास इंटरनेट की सुविधा थी। 2019 के लोकनीति सर्वे के अनुसार केवल एक तिहाई घरों में स्मार्टफोन था। यह जरूर है कि लॉकडाउन के बाद, 2020 में कई लोगों ने स्मार्टफोन खरीदे भी हैं। लेकिन खरीदने वालों में कई ऐसे हैं जिन्हें कर्ज लेना पड़ा और इसके बावजूद कई बच्चे वंचित हैं।

इस रविवार हमने दिल्ली के मुनिरका की एक बस्ती के 10-12 बच्चों से अनौपचारिक बात की। केवल एक ही बच्ची ऐसी थी, जिसके पिताजी के पास फोन था, लेकिन चूंकि वे ऑटो चलाते हैं, इसलिए केवल शाम में वह क्लास में जुड़ सकती है। आठवीं में पढ़ने वाली सपना ने प्रार्थनापूर्ण आंखों से स्कूल खुलवाने की मांग की। घर पर रहने से वह घर और परिवार की दुकान के काम के कारण पढ़ाई के लिए फुर्सत नहीं निकाल पा रही। परीक्षा के लिए सहेली ने फोन इस्तेमाल करने दिया, तब वह दे पाई।

स्कूल बंद होने से लड़कियों का लड़कों से, छोटे बच्चों का बड़े बच्चों से और गरीब बच्चों का सक्षम बच्चों से, ज्यादा नुकसान हो रहा था। शिक्षा केवल पढ़ना-लिखना और गिनती ही नहीं, बच्चे स्कूल में अन्य बातें भी सीखते हैं (जैसे औरों से बातचीत, खुद से उठना-बैठना, खाना-पीना, लाइन में लगना आदि)। कुछ बच्चों के लिए स्कूल घर के तनाव और हिंसा से छुटकारा प्रदान करता है।

स्कूल खोलने का मतलब यह नहीं कि सभी बच्चे रोज़ स्कूल जाएं। स्कूल में बच्चों की संख्या नियंत्रित करने के कई तरीके हैं: कुछ स्कूल सुबह, कुछ दोपहर में चलें या रोज आधी उपस्थिति रहे। घर पर पढ़ सकने वाले घर पर रहें। वैज्ञानिकों के अनुसार बच्चों में संक्रमण का डर कम है और कोरोना होता भी है तो गंभीर होने की आशंका कम है।

लोगों में डर है कि बच्चे बुजुर्गों को संक्रमित न कर दें। इसके लिए बड़े-बूढ़ों को जागरूक करें कि मास्क जरूरी है और उनकी लापरवाही से अगली पीढ़ी का नुकसान हो रहा है। स्कूल में बच्चों को हाथ धोने, मास्क पहनने का महत्व बता सकते हैं, ताकि वे घर में बड़ों को भी समझा सकें।

दुनिया के कई देशों में या तो प्राथमिक स्कूल बंद हुए ही नहीं या खुल चुके हैं। यूनिसेफ और यूनेस्को ने भी बयान जारी किया है कि लॉकडाउन में स्कूल सबसे आखिर में बंद होने चाहिए और सबसे पहले खुलने चाहिए। बच्चों और देश के भविष्य के लिए यह जरूरी है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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